बहुप्रतीक्षित नोबेल शांति पुरस्कारों का एलान शुक्रवार को हुआ। यह पुरस्कार इस साल विश्व के सबसे अशांत क्षेत्र के नाम रहा, जिसके विजेता जेल में बंद बेलारूस के मानवाधिकार कार्यकर्ता एलेस बियालियात्स्की, रूसी मानवाधिकार संगठन ‘मेमोरियल’ और यूक्रेनी संगठन ‘सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज’ बने हैं।
नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में हुए शांति पुरस्कार की घोषणा संयोगवश रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के 70वें जन्मदिन पर हुई है, जिन्हें यूक्रेन पर जंग थोपने का जिम्मेदार माना जा रहा है। नोबेल समिति ने शांति पुरस्कार के जरिए पुतिन को संदेश देने का भी काम किया है। तीनों नामों की घोषणा करते हुए नॉर्वेजियन नोबेल समिति की अध्यक्ष बेरिट रीज-एंडरसन ने कहा, इस बार का शांति पुरस्कार मानवाधिकार, लोकतंत्र और पड़ोसी देशों बेलारूस, रूस व यूक्रेन में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पैरोकारों को सम्मानित करने के लिए दिया गया है।
उन्होंने कहा, इन विजेताओं ने मानवीय मूल्यों, सैन्यवाद विरोध और कानून के पक्ष में अपने निरंतर प्रयासों के जरिये अल्फ्रेड नोबेल के राष्ट्रों के बीच शांति और बंधुत्व के दृष्टिकोण को पुनर्जीवित और सम्मानित किया है। इसकी दुनिया में आज सबसे ज्यादा जरूरत है।
रीज-एंडरसन ने कहा, काफी निजी कठिनाइयों के बावजूद बियालियात्स्की ने मानवाधिकारों व लोकतंत्र की मुहिम नहीं छोड़ी। नोबेल समिति बेलारूसी सरकार से उन्हें जेल से रिहा करने की अपील करती है। हालांकि, उन्होंने आशंका भी जताई कि शांति पुरस्कार देश में विजेता के लिए अतिरिक्त परेशानियां पैदा कर सकता है। पुतिन को संदेश देने के सवाल पर रीज-एंडरसन बोलीं, समिति शांति सम्मान किसी कार्य के लिए देती है, न कि किसी के खिलाफ। एजेंसी
संघर्ष से नोबेल तक का सफर….
बियालियात्स्की : 1980 से छेड़ी लोकतंत्र की मुहिम
नोबेल शांति पुरस्कार ऐसे व्यक्ति या संस्था को दिया जाता है, जिन्होंने विश्व में शांति स्थापित करने या शांति को बढ़ावा देने के लिए बेहतरीन काम किया है। इन्हीं में एक बियालियात्स्की हैं, जो बेलारूस में 1980 के मध्य से ही लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता रहे हैं। तमाम दबावों के बावजूद वह अधिनायकवादी देश में मानवाधिकार, नागरिक अधिकारों के लिए खुलकर काम करते आए हैं।
- बियालियात्स्की ने मानवाधिकार केंद्र विआस्ना की स्थापना की। इसके तहत हुए प्रयासों के लिए उन्हें राइट लाइवलिहुड अवार्ड-2020 से नवाजा गया। उसी दौरान सरकार विरोधी प्रदर्शन के कारण उन्हें हिरासत में लेकर जेल में डाल दिया गया और तब से वह बिना मुकदमे के जेल में बंद हैं।
- नोबेल समिति के मुताबिक, यह शांति पुरस्कार राष्ट्रपति पुतिन को दिखाने के लिए नहीं है बल्कि उन्होंने तो खुद नागरिक समाज और मानवाधिकार पैरोकारों को दबाकर अपनी ओर ध्यान खींचा हैं।
मेमोरियल : सोवियत संघ के जमाने से साम्यवादी दमन पर नजर
नोबेल पुरस्कार दूसरा विजेता संगठन मेमोरियल सोवियत संघ के दौर में 1987 में बना था, जिसका कार्य साम्यवादी दमन के पीड़ितों की यादें सुनिश्चित रखना था। संघ के विघटन के बाद भी इसने रूस में मानवाधिकार के दमन की जानकारी जुटाना जारी रखा और राजनीतिक बंदियों के हाल पर भी नजर रखी।
सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीजः यूक्रेन को पूर्ण लोकतंत्र बनाने का किया काम
सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज की स्थापना यूक्रेन में 2007 के दौरान जारी उथल-पुथल के बीच मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए हुई थी। तब से संगठन यूक्रेनी नागरिक समाज को मजबूत करने और सरकार पर देश को पूर्ण लोकंतत्र बनाने के लिए दबाव बनाता रहा है। फरवरी में रूसी आक्रमण के बाद से यह यूक्रेनी नागरिकों पर रूसी सेना के अपराधों को दस्तावेजों में दर्ज कर रहा है।

