रहे सदा क्षणभंगुरता का भान:प्रदीप छाजेड़ ( बोरावड़ )

रहे सदा क्षणभंगुरता का भान:प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )
हम सब अपने – अपने कर्म अनुसार जन्म लेकर आयें है । इस जग में जीते तो सभी हैं पर बेहतर वही जी पाता है जो जीवन की क्षणभंगुरता का बराबर अहसास रखता है। वह सदा स्मरण करता रहता है कि मैं अपने सुकर्मों के सुफल से इस जग में आया हूँ और कुछ लेकर नहीं अपितु खाली हाथ आया हूँ तथा यहाँ से आयुष्य पूर्ण कर खाली हाथ ही जाऊँगा यही अलिखित शाश्वत नियम है। आदर्शों का आभूषण मात्र बनने से जीवन आदर्श नहीं होता, आदर्श आचरण के रूप में घटित हों तो वह आदर्श जीवन निश्चित है। दुनिया के सारे सुख-वैभव-ऐश्वर्य फीके यदि मन में शांति नही है । मन को साधना बहुत ज़रूरी है जिससे हमारी अपनी असीमित इच्छाओं पर अंकुश लगे ।हमारे मन की शांति को जिन चीजों से खतरा है, हमें उन चीजों से भी बचकर रहना चाहिए । वह हम अपने मन को थोडा बड़ा और मजबूत बनाएँगे तो मन की शांति के प्रवेश के लिए विवेक द्वार सदा खुला रहेगा। वह जो व्यक्ति इस ध्रुव सत्य यानि जन्म के साथ मृत्यु अवश्यंभावी है को सदा स्मरण रखता है वही जीवन की वास्तविकता का वरण कर सकता है । वह तब समझ लेता है कि मृत्यु तो एक अटल सत्य है और एक न एक दिन घटित होने वाला अवश्यम्भावी तथ्य है । वह मृत्यु का भान तब जीवन की क्षणभंगुरता को समझने का ज्ञान बन जाता है। हमारा जीवन तो नश्वर है वह एक न एक दिन समाप्त हो ही जाोएगा। वह जो इस अटल सत्य को जान कर जीने वाला सदा सार्थक जीवन जिएगा और पल-पल जीवन का सदुपयोग करेगा , हर क्षण जागरूक रहेगा। वह यह सब हमारे संज्ञान में हर क्षण रहता है तभी हम धर्म-अधर्म के ज्ञान से जी सकते हैं।

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