विकास के नाम पर उजड़ती गांवों की हरियाली
प्रवीण कुमार
उदयपुर, राजस्थान
राजस्थान का उदयपुर केवल ऐतिहासिक रूप से राजा-महाराजाओं के किला के रूप में ही नहीं बल्कि झीलों, पहाड़ों और हरियाली के लिए भी जाना जाता है। लेकिन शहर के उत्तरी हिस्से में बसे सुखेर गांव की कहानी इस खूबसूरत पहचान के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसा यह इलाका कभी शांत वातावरण, खेतों, पेड़-पौधों और मौसमी जलधाराओं से घिरा हुआ था।
लेकिन तेजी से फैलते शहरीकरण के कारण सुखेर की तस्वीर बदलने लगी है। पर्यटन के विस्तार के साथ शहर में महंगी होती ज़मीन के कारण लोगों ने शहर से बाहर की जमीनों की ओर रुख किया। धीरे-धीरे खेतों की जगह मकानों ने ले ली और प्राकृतिक निर्माण की जगह कंक्रीट की इमारतें खड़ी होने लगीं। जिस जमीन पर कभी फसल उगती थी, वहां अब कॉलोनियां दिखाई देने लगी हैं। यह बदलाव केवल जमीन के इस्तेमाल में परिवर्तन नहीं है, बल्कि उस पूरे पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव है जिस पर गांव का जीवन टिका था।
सुखेर में बढ़ते निर्माण के साथ पानी पर दबाव भी बढ़ा है। आबादी बढ़ने पर घरेलू जरूरतें बढ़ती है और व्यावसायिक गतिविधियां भी अतिरिक्त पानी मांगती हैं। ऐसे में भूजल पर निर्भरता बढ़ती है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2023 के आकलन में उदयपुर शहरी क्षेत्र में भूजल दोहन का स्तर उपलब्ध वार्षिक निकासी योग्य संसाधन के लगभग 99.86 प्रतिशत तक दर्ज किया गया था। यानी शहरी क्षेत्र में भूजल पर दबाव कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इस आंकड़े से लगाया जा सकता है। राजस्थान की व्यापक तस्वीर भी बहुत आश्वस्त करने वाली नहीं है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के मई 2025 के आकलन में अगस्त 2024 से मई 2025 के बीच विश्लेषित 972 निगरानी केंद्रों में 76 प्रतिशत पर जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई।
सुखेर के आसपास औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार इस चिंता को और गंभीर बनाता है। विकास और रोजगार के नाम पर जब उद्योग आते हैं तो उम्मीद होती है कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन यदि उद्योग स्थानीय आबादी को पर्याप्त रोजगार देने के बजाय हवा, पानी और जमीन पर दबाव बढ़ाए, तो विकास का लाभ और उसकी कीमत दोनों असमान हो जाते हैं। सुखेर औद्योगिक क्षेत्र में ई-कचरा प्रबंधन से जुड़ी अधिकृत इकाइयों का भी सरकारी रिकॉर्ड मौजूद है, जो बताता है कि इस क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां कितनी विविध हो चुकी हैं।
इसकी वजह से पिछले कुछ वर्षों में उदयपुर की वायु गुणवत्ता में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता रहता है। सिर्फ हवा ही नहीं, कचरा भी तेजी से बढ़ते शहरीकरण की बड़ी चुनौती है। 2025 के राजस्थान सरकार के अनुपालन संबंधी आंकड़ों में उदयपुर नगर निकाय क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 279.12 टन ठोस कचरा पैदा होने का अनुमान दर्ज है। उसके मुकाबले उपलब्ध प्रसंस्करण व्यवस्था की क्षमता सीमित है। शहर का कचरा जब आसपास के ग्रामीण इलाकों तक पहुंचता है तो उसका असर केवल सौंदर्य पर नहीं पड़ता। खुले में फेंका गया कचरा मिट्टी और जल स्रोतों को प्रभावित कर सकता है तथा प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट के कारण स्थानीय पर्यावरण पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
सुखेर जैसे गांवों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अब पूरी तरह गांव भी नहीं रह गए और शहर का हिस्सा बनने के बावजूद शहर जैसी बुनियादी पर्यावरणीय व्यवस्था भी उन्हें नहीं मिली। खेत घट रहे हैं, निर्माण बढ़ रहा है, वाहनों की संख्या बढ़ रही है, औद्योगिक गतिविधियां बढ़ रही हैं और आबादी का दबाव लगातार बढ़ रहा है। इस बदलाव के बीच बरसाती पानी के प्राकृतिक रास्ते बाधित होने, खुले क्षेत्रों के कम होने और भूजल पुनर्भरण की जमीन घटने का खतरा भी बढ़ता है। इसका असर अंततः अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी पड़ेगा।
इसका समाधान विकास रोकना नहीं है। रोजगार, उद्योग, आवास और बेहतर सुविधाएं किसी भी क्षेत्र की जरूरत हैं। लेकिन विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें गांव की जमीन को केवल निर्माण की जमीन न माना जाए। सुखेर और उसके जैसे क्षेत्रों के लिए स्पष्ट हरित क्षेत्र, जलस्रोतों और बरसाती जल धाराओं की सुरक्षा, भूजल दोहन की निगरानी, वर्षा जल संचयन, उद्योगों की नियमित पर्यावरणीय निगरानी और ठोस कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण को विकास योजना का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्थानीय समुदाय की है। सुखेर में कुछ जागरूक लोग इस बदलते पर्यावरण को समझते हुए जागरूकता अभियान चला रहे हैं। यह प्रयास छोटा जरूर है, लेकिन बदलाव की शुरुआत अक्सर ऐसे ही छोटे कदमों से होती है। जरूरत है कि पंचायत, नगर निकाय, प्रशासन, उद्योग और स्थानीय नागरिक मिलकर यह तय करें कि विकास की रफ्तार पर्यावरण की कीमत पर नहीं बढ़ेगी।
सुखेर को केवल एक गांव की कहानी मानकर छोड़ देना आसान होगा। लेकिन यह दरअसल उन हजारों ग्रामीण बस्तियों का भविष्य है जो तेजी से बढ़ते शहरों की सीमा पर खड़े हैं। यदि आज खेतों, जलस्रोतों, पहाड़ियों और हरित क्षेत्रों को बचाने की योजना नहीं बनाई गई तो आने वाले समय में कंक्रीट तो बढ़ेगा, लेकिन जीवन के लिए जरूरी प्राकृतिक आधार लगातार सिकुड़ता जाएगा। शहर जब अपनी सीमा से बाहर निकलता है तो सबसे पहले उसकी नजर आसपास की जमीन पर पड़ती है। खेत, चारागाह, जल स्रोत और हरित क्षेत्र धीरे-धीरे निर्माण क्षेत्र में बदलने लगते हैं। विकास के आंकड़ों में यह विस्तार उपलब्धि दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर इसका दूसरा चेहरा भी है। जिसे नज़रअंदाज़ करना मानव सभ्यता के विनाश का कारण बन सकता है. सवाल यह है कि क्या शहर को फैलाने की कीमत गांवों की हवा, पानी, मिट्टी और हरियाली से चुकाई जानी चाहिए?
(यह ले
खक के निजी विचार हैं)

