गांव की महिलाओं के लिए इलाज अब भी आसान नहीं  

 

गांव की महिलाओं के लिए इलाज अब भी आसान नहीं

अस्मिता कुमारी

सीतामढ़ी, बिहार

 

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें लगातार कई योजनाओं और पहलों का उल्लेख करती रही हैं। इनमें आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीब परिवारों को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के माध्यम से गांव स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए जननी सुरक्षा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, मुफ्त दवा और मुफ्त जांच की व्यवस्था, तथा डिजिटल स्वास्थ्य मिशन जैसी पहलों को स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया जाता है।

 

सरकारें यह भी दावा करती हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा रही है, टीकाकरण अभियान का दायरा विस्तारित किया गया है और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच को बेहतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन बिहार के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर इन दावों से काफी अलग दिखाई देती है। खासकर महिलाओं और किशोरियों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी केवल एक समस्या नहीं, बल्कि लैंगिक असमानता और सामाजिक असमानता का प्रश्न भी है। जब गांव में अस्पताल नहीं होता, दवाइयां उपलब्ध नहीं होतीं और डॉक्टरों की कमी बनी रहती है, तब इसका सबसे अधिक असर उन महिलाओं पर पड़ता है जिनकी आवाज़ और ज़रूरतें पहले से ही परिवार और समाज में पीछे धकेल दी जाती हैं।

 

सीतामढ़ी जिले के रीगा प्रखंड के रामनगर गांव की स्थिति इसका एक उदाहरण है। गांव में स्वास्थ्य सुविधा की व्यवस्था नहीं है। छोटी से छोटी बीमारी के लिए भी लोगों को रीगा के प्रखंड अस्पताल तक जाना पड़ता है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि बुखार, पेट दर्द, खून की कमी, गर्भावस्था से जुड़ी जांच या बच्चों के टीकाकरण जैसी सामान्य जरूरतों के लिए भी कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह दूरी केवल यात्रा की नहीं, बल्कि अतिरिक्त खर्च, मजदूरी छूटने और समय की भी कीमत बन जाती है। कई बार महिलाएं अपने इलाज को टाल देती हैं क्योंकि परिवार के सीमित संसाधनों में पुरुषों और बच्चों की जरूरतों को प्राथमिकता दी जाती है।

 

स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता महिलाओं के जीवन पर कई स्तरों पर प्रभाव डालती है। किशोरियों के लिए मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं, एनीमिया और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों पर खुलकर बात करना पहले ही मुश्किल होता है। जब नजदीक में अस्पताल या महिला स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध नहीं होते, तो वे अपनी समस्याओं को छिपाने के लिए मजबूर हो जाती हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित जांच, आयरन और कैल्शियम की दवाइयों तथा समय पर चिकित्सकीय सलाह का अभाव कई बार गंभीर जटिलताओं का कारण बन जाता है। प्रसव के समय अस्पताल तक पहुंचने में होने वाली देरी मां और नवजात दोनों के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

 

ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना केवल दूरी का प्रश्न नहीं है। कई बार उन्हें अकेले बाहर जाने की अनुमति नहीं मिलती, घर और बच्चों की जिम्मेदारी छोड़ना मुश्किल होता है और यात्रा के लिए अलग से पैसे की व्यवस्था करनी पड़ती है। ऐसी परिस्थितियों में महिलाएं अक्सर घरेलू उपचार या बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयों पर निर्भर हो जाती हैं। इसका असर उनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, लेकिन समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य को अक्सर प्राथमिकता नहीं दी जाती।

 

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को उजागर करते हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सरकारी अस्पतालों में स्वीकृत पदों के मुकाबले लगभग 58 प्रतिशत डॉक्टरों के पद खाली हैं। प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों तथा पैरामेडिकल कर्मचारियों के लगभग 60 प्रतिशत पद रिक्त पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में 23,475 पद और माध्यमिक स्वास्थ्य संस्थानों में 18,909 पद खाली थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार बिहार में जितने डॉक्टर होने चाहिए, उसकी तुलना में उपलब्ध डॉक्टरों की संख्या लगभग आधी है।¹

 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि बिहार में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आवश्यक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) की संख्या 622 होनी चाहिए, लेकिन लंबे समय तक केवल लगभग 70 केंद्र ही पूरी तरह कार्यरत रहे। राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उपकेंद्रों की भी भारी कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों, लैब तकनीशियनों और फार्मासिस्टों के हजारों पद खाली हैं। हाल के वर्षों में सरकार ने नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पूरा लाभ अभी तक ग्रामीण समुदायों तक नहीं पहुंच पाया है।

 

स्वास्थ्य व्यवस्था की यह कमी केवल आंकड़ों का विषय नहीं है। इसका असर हर उस महिला पर पड़ता है जो प्रसव के दौरान समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाती, हर उस किशोरी पर पड़ता है जो एनीमिया से जूझते हुए भी इलाज नहीं करा पाती और हर उस बुजुर्ग महिला पर पड़ता है जो दवा के अभाव में दर्द सहने को मजबूर रहती है। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव महिलाओं के श्रम, उनके समय और उनके जीवन को अदृश्य बना देता है।

 

आज जरूरत केवल नए अस्पताल बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करने की है जो महिलाओं और किशोरियों की जरूरतों को केंद्र में रखे। गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना, दवाइयों की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना, महिला डॉक्टरों और नर्सों की नियुक्ति बढ़ाना तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक महिलाओं की आसान पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है। जब तक ग्रामीण महिलाओं को सम्मानजनक और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलेंगी, तब तक विकास और महिला सशक्तिकरण के दावे अधूरे ही रहेंगे।

(यह लेखिका की निजी राय है)

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