तिरंगा और मेरा कवि विद्रोही-
जबतक भारत में बेंच पसीना कोई भूखा-नंगा है
जबतक भारत में धर्म-जाति के नाम भड़कता दंगा है
जबतक भारत का सम्विधान सत्ता के खड़ा कटघरे में
कवि कैसे लिख दे लालकिला अपना आज़ाद तिरंगा है
जबतक वोटों के क्रय-विक्रय से तय होते कुर्सी के कद
तबतक आत्मा लोकतन्त्री मुस्कान अधर क्या लाएगी?
जबतक मतदाता से कटकर तुम सुख-सुविधाओं के पीछे
तबतक विद्रोही वाणी केवल गीत क्रान्ति के गाएगी।
गांधी के बन्दर राजघाट के पण्डों कान खोल सुन लो
दिन दूर नहीं वह जब जनता संसद तक चढ़कर आएगी
यौवन के उर में आक्रोश का ज्वार कभी यदि उमड़ा तो
कुर्सी की लालच राम नाम है सत्य यही दुहराएगी
फिर कोठी एसी कार और लालसा तुम्हारी सत्ता की
संसद से खींच-खींच तुमको फिर सड़कों पर दौड़ाएगी।
जबतक मतदाता से कटकर तुम सुख-सुविधाओं के पीछे
तबतक विद्रोही वाणी केवल गीत क्रान्ति के गाएगी।

