ब्यूरो चीफ आर एल पाण्डेय
लखनऊ। इंदु मेडिकल सेंटर के फाउंडर एंड डायरेक्टर डॉ रजनीश श्रीवास्तव ने उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब में पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में डायबिटिज अथवा मधुमेह सामान्यतया पायी जाने वाली एक ऐसी बीमारी है जिसके शिकार बहुतायत में न केवल वृद्ध बल्कि युवा भी है। यदि भारत को दुनिया में डायबिटिज की राजधानी भी कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि भारत की 10 प्रतिशत से अधिक की जनसंख्या इस बीमारी की चपेट में है और दुनिया के डायबिटिज रोगियों में 17 प्रतिशत से अधिक रोगी भारत में ही पाये जाते हैं।
टाईप-2 डायबिटिज क्या है?
टाईप 2 डायबिटिज जिसे (type 2 diabetes mellitus) भी कहा जाता है यह शरीर में इस प्रकार का असंतुलन पैदा कर देता है जिससे शरीर को शुगर पचाने ( absorb) करने में कठिनाई होने लगती है। इस असंतुलन के कारण अन्य समस्याऐं जैसे शरीर में उर्जा व वसा के उचित भण्डारण व प्रोसेसिंग की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
शर्करा हमारे शरीर के समस्त उतकों (cells) के सुचारू रूप से कार्य करने के लिये आवश्यक है। यह हमारे शरीर में एक प्रकार के हार्मोन जिसे इंसुलिन कहते हैं, के माध्यम से अवशोषित होता है। यदि हमारे शरीर में पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन मौजूद नहीं है अथवा हमारा शरीर इंसुलिन के प्रति सुचारू रूप से संवेदनशील नहीं है तब शर्करा हमारे खून में पहुँच जाती है। डायबिटिज के मरीजों के साथ यही होता है। खून में शर्करा की उच्च मात्रा, यदि उसका समय पर समुचित इलाज न किया जाये तो कई तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्यायें उत्पन्न कर देती हैं।
डायबिटिज के कारक
1. आनुवांशिक कारक- प्रायः देखा गया है कि अधिकांश डायबिटिज मरीज ऐसे परिवारों से सम्बन्धित होतें हैं जिनके कोई न कोई सदस्य टाईप-2 डायबिटिज अथवा उससे सम्बन्धित अन्य रोगों जैसे हाई कोलेस्ट्रोल, हाई ब्लड प्रेशर, Triglyceride levels and obesity आदि से ग्रस्त रहें हैं। ऐसे मरीजों को उनके जीवनकाल में टाइप-2 डायबिटिज होने की सम्भावना उन लोगों की अपेक्षा 5-10 गुना अधिक होती है जिनके परिवार के सदस्यों की डायबिटिज हिस्ट्री नहीं है।
2. जीवन शैली कारक- अधिक मात्रा में अस्वास्थ्यकारी भोजन लेना तथा पर्याप्त मात्रा में शारीरिक गतिविधि जैसे व्यायाम इत्यादि न करना भी इसके प्रमुख कारकों में एक है जिसके कारण ऐसे लोगों का वजन बढ़ता है जिसके परिणाम स्वरूप टाईप-2 डायबिटिज का खतरा भी बढ़ता जाता है।
3. गर्भावस्था— कुछ महिलाओं में गर्भावस्था की अवधि में डायबिटिज हो जाती है जिसे गैस्टेशनल डायबिटिज कहा जाता है। गैस्टेशनल डायबिटिल टाईप 2 डायबिटिज के समान ही है परन्तु यह बच्चे को जन्म देने के पश्चात् स्वतः समाप्त भी हो जाती है। लेकिन जिन महिलाओं में गर्भावस्था की अवधि में गैस्टेशनल डायबिटिज हो जाती है उनमें उनके शेष जीवनकाल में टाईप-2 डायबिटिज होने का खतरा बना रहता है।तो उसको नियंत्रित करने के लिए” ABCs” का पालन करना चाहिए:
“A” stands for “AIC”- AIC ऐसी खून की जांच है जिसके अन्तर्गत मरीज के पिछले कुछ महीनों में रहे औसत ब्लड शुगर लेवल की जाँच की जाती है।
“B” stands for “Blood pressure” मधुमेह के रोगियों का ब्लड प्रेशर भी शुगर लेवल के समान ही नियंत्रित बनाये रखना आवश्यक होता है। उच्च रक्त चाप के मरीजों में हार्ट अटैक, स्ट्रोक तथा किडनी सम्बन्धी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
“C” stands for “cholesterol “- कोलेस्ट्रोल खून में पाये जाने वाला मोम के तरह का पदार्थ होता है। उच्च कोलेस्ट्रोल की वजह से भी मरीजों में हार्ट अटैक, स्ट्रोक तथा अन्य बीमारियों
का खतरा बढ़ जाता है।
डायबिटिज रोगियों को अन्य सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा हार्ट अटैक, स्ट्रोक का खतरा 2-3 गुना तक अधिक रहता है। ऐसे रोगियों में युवावस्था में ही हार्ट अटैक की सम्भावना बनी रहती है। ऐसी स्थिति में हार्ट अटैक ज्यादा गम्भीर तथा मारक होता है। इसके अलावा ऐसे मरीजों में किडनी की बीमारियाँ होने की सम्भावना भी अधिक रहती है।
डाक्टर श्रीवास्तव ने बताया कि मरीज अपना “ABCs” नियंत्रण में रखकर काफी हद तक इन खतरों से बच सकते हैं। डॉक्टर श्रीवास्तव के अनुसार उक्त का प्रयोग करें।
भोजन, दवा
अनुशासन
डॉ कालिंदी श्रीवास्तव ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि
DIABETES IN PREGNANCY
Gestational Diabetes Mellitus एक ऐसी स्थिति है जिसमें महिलाओं ने प्रेगनेन्सी के दौरान शुगर लेवल बढ़ जाता है। ऐसा लगभग 4 प्रतिशत प्रेगनेन्सी में होता है।
Gestational Diabetes Mellitus का इलाज जल्द से स्टार्ट होना चाहिए क्योंकि इसमें माँ और बच्चे दोनों को ही परेशानी हो सकती है। अधिकतर गर्भवती महिलाओं का परीक्षण गर्भावस्था के 24वें व
28वें सप्ताह के बीच में किया जाता है।
माँ के लिए प्रेगनेन्सी में शुगर के नुकसान
Gestational Diabetes Mellitus वाली महिलाओं में शिशु का आकार बड़ा होने के कारण
सीजेरियन डिलेवरी की सम्भावना बढ़ जाती है।
इन महिलाओं ने हाई बी०पी० का रिस्क बढ़ जाता है।
इन महिलाओं में गर्भावस्था के बाद टाइप-2 डायबिटीज होने का यदि शुरूआत प्रेगनेन्सी में शुगर है तो इन महिलाओं में बर्थ डिफेक्ट और एबोरशन का
खतरा बढ़ जाता है।
बच्चों के लिए प्रेगनेन्सी में शुगर के नुकसान -शिशु एक्स्ट्रा शुगर को फाइट के रूप में स्टोर करता है और उसका साइज बड़ा कर सकता है इसको मैक्रोसोमिया कहते हैं।
जन्म के बाद शिशु का लो ब्लड शुगर होना।
पीलिया होना।
इन बच्चों में मोटापा और डायबिटीज का खतरा बढ़ जाना।
Gestational Diabetes Mellitus का उपचार इलाज का उद्देश्य माता बच्चे में जी०डी०एम० के जोखिम कम करना और माँ के ब्लड में शुगर लेवल को मेनटेन रखना।

