(नईदिल्ली)कोर्ट-कचहरी से बाहर विवाद निपटाने की ओर बढ़ रहा भारत

(नईदिल्ली)कोर्ट-कचहरी से बाहर विवाद निपटाने की ओर बढ़ रहा भारत
0-77 प्रतिशत कानूनी विशेषज्ञ मध्यस्थता के भविष्य को लेकर आशावादी, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बदलेगी विवाद समाधान की तस्वीर
नई दिल्ली,13 सितंबर (आरएनएस)। देश में व्यावसायिक और कानूनी विवादों के समाधान का तरीका तेजी से बदल रहा है। लंबे समय तक चलने वाली अदालती प्रक्रिया के विकल्प के रूप में वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था यानी अदालत से बाहर विवाद निपटाने की प्रक्रिया अब अधिक संगठित, लचीली और तकनीक आधारित होती जा रही है। सलाहकार संस्था ईवाई और आर्ना लॉ की ताजा रिपोर्ट ‘वैकल्पिक विवाद समाधान का नया दौर : रुझान, चुनौतियां और अवसरÓ में यह बात सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, 77 प्रतिशत कानूनी पेशेवर भारत में मध्यस्थता के भविष्य को लेकर आशावादी हैं। वहीं, 52 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे वर्ष 1996 के मध्यस्थता एवं सुलह कानून के प्रावधानों से पूरी तरह परिचित हैं। यह सर्वेक्षण 120 से अधिक कानूनी पेशेवरों की राय पर आधारित है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था अब अधिक व्यवस्थित और तकनीकी रूप से सक्षम प्रक्रिया की ओर बढ़ रही है। सर्वेक्षण में 72 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने संस्थागत और मिश्रित विवाद समाधान व्यवस्था को प्राथमिकता दी है।
संस्थागत व्यवस्था में विवाद का निपटारा किसी स्थापित संस्था के निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के तहत किया जाता है, जबकि मिश्रित व्यवस्था में विवाद सुलझाने के दो या अधिक तरीकों का संयोजन किया जाता है। ऐसी व्यवस्था व्यावसायिक विवादों में स्पष्ट प्रक्रिया, प्रशासनिक सहायता और आवश्यक लचीलापन उपलब्ध कराती है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मध्यस्थता के लिए सिंगापुर की व्यवस्था को काफी पसंद किया जाता है। हालांकि, देश में अपने मध्यस्थता संस्थानों के विकास को भी सकारात्मक संकेत माना गया है। इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर की स्थापना और मुंबई सेंटर फॉर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन की बढ़ती भूमिका से भारत को अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
ईवाई फॉरेंसिक एंड इंटीग्रिटी सर्विसेज के योगेन वैद्य ने कहा कि भारत की विवाद समाधान व्यवस्था निर्णायक दौर में पहुंच रही है। कंपनियां अब ऐसे समाधान चाहती हैं, जिनमें लचीलेपन के साथ स्पष्ट प्रक्रिया और संस्थागत सहयोग भी उपलब्ध हो। उन्होंने कहा कि मजबूत संस्थानों, प्रभावी नियमों, विशेषज्ञता और बेहतर मामले प्रबंधन के माध्यम से विवाद समाधान की प्रक्रिया को अधिक भरोसेमंद और उपयोगकर्ता के लिए सुविधाजनक बनाया जा सकता है।
रिपोर्ट में गुजरात अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रौद्योगिकी नगर की स्थापना को भारत की वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है। सर्वेक्षण में भारत को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र के रूप में विकसित किए जाने को लेकर सकारात्मक रुख सामने आया है।
सरकार के भारत को वैश्विक मध्यस्थता केंद्र के रूप में स्थापित करने पर जोर के बीच 41 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने देश में मध्यस्थता के भविष्य को लेकर मजबूत सकारात्मकता व्यक्त की।
मध्यस्थता की प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाने में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। 65 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि तकनीक कानूनी कार्यवाही को बेहतर बनाती है। वहीं, 49 प्रतिशत ने वीडियो सम्मेलन को सबसे उपयोगी तकनीकी साधन बताया।
इसके अलावा, 37 प्रतिशत उत्तरदाताओं के अनुसार वीडियो सम्मेलन सुनवाई में लगने वाला समय कम कर उत्पादकता बढ़ाने में मदद करता है। इससे दूर-दराज के पक्षकारों और विशेषज्ञों की भागीदारी भी आसान हुई है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर कानूनी क्षेत्र में उत्साह के साथ सावधानी भी दिखाई दे रही है। सर्वेक्षण में 51 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि उचित सुरक्षा उपायों के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल मध्यस्थता की दक्षता बढ़ा सकता है।
हालांकि, कानूनी प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल के साथ गोपनीयता, आंकड़ों की सुरक्षा, निर्णयों की विश्वसनीयता और मानवीय निगरानी जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देना आवश्यक माना गया है।
मध्यस्थता की लागत को लेकर भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। 43 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने सुनवाई को मध्यस्थता प्रक्रिया का सबसे खर्चीला चरण बताया। इसके बाद 41 प्रतिशत लोगों ने दस्तावेजों की खोज और साक्ष्य जुटाने को सबसे महंगा काम माना।
वहीं, 73 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे मामलों में होने वाली देरी को रोकने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं की समय-सीमा कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, संस्थागत मध्यस्थता के सामने अभी भी कई चुनौतियां हैं। 52 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मानकीकरण और संस्थागत सहयोग को इसका सबसे बड़ा लाभ बताया। वहीं, 42 प्रतिशत ने अनुभवी मामले प्रबंधकों की आवश्यकता पर जोर दिया। 26 प्रतिशत ने स्पष्ट संवाद को महत्वपूर्ण माना, जबकि 21 प्रतिशत ने विवादों के कुशल और तेज निपटारे को प्राथमिकता दी।
हालांकि, मध्यस्थता के फैसलों को प्रभावी ढंग से लागू कराना अभी भी चिंता का विषय है। 38 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मध्यस्थता के फैसलों के क्रियान्वयन को प्रमुख चुनौती बताया। वहीं, 28 प्रतिशत के लिए अदालती हस्तक्षेप अब भी चिंता का कारण बना हुआ है।
आर्ना लॉ के संस्थापक श्रेयस जयसिम्हा के अनुसार, सर्वेक्षण मध्यस्थता के ऐसे बाजार की तस्वीर पेश करता है जो लगातार परिपक्व हो रहा है। अब पक्षकार केवल कानूनी उपाय उपलब्ध होने को पर्याप्त नहीं मानते, बल्कि फैसले की गुणवत्ता और उसकी विश्वसनीयता को भी महत्व दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यदि भारत को अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करनी है तो कानूनी सुधारों के साथ फैसलों को भरोसेमंद तरीके से लागू कराने की व्यवस्था, सक्षम संस्थानों और संबंधित क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले पेशेवरों की आवश्यकता होगी।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत के पास ऐसी एकीकृत वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था विकसित करने का बड़ा अवसर है, जिसमें विश्वसनीय संस्थान, प्रभावी और लागू किए जा सकने वाले फैसले, पेशेवर विशेषज्ञता तथा जिम्मेदारी के साथ तकनीक का इस्तेमाल शामिल हो।
आने वाले वर्षों में जटिल व्यावसायिक विवादों के समाधान में मध्यस्थता की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहने की संभावना है, जबकि सुलह और मिश्रित विवाद समाधान जैसी व्यवस्थाओं का दायरा भी बढ़ सकता है। इससे न केवल अदालतों पर लंबित मामलों का दबाव कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक विवादों के समाधान के एक विश्वसनीय केंद्र के रूप में स्थापित करने का अवसर भी मिलेगा।
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