मेरा बचपन मेरा गांव

मेरा बचपन मेरा गांव

किरण बिष्ट
सुराग, उत्तराखंड

मेरा गाँव, बचपन की वह मीठी यादें हैं,
जहाँ मेरा हँसता-खेलता बचपन बीता,
वहीं मेरी सारी यादें गुज़रीं हैं,
वहीं मैं पली-बढ़ी, सपनों को जिया,
जहाँ मेरा पूरा परिवार रहता था,
दादा-दादी और भाई-बहनों का साथ था,
उनके संग ही खेलती और कूदती थी मैं,
हर दिन जैसे मेरे लिए कोई त्यौहार था,
पता ही नहीं चला कब गुज़र गया बचपन,
कब बीत गया वह सुनहरा समय,
जाने कब आ गईं मुझ पर जिम्मेदारियाँ,
कब आ बैठी मेरे कंधों पर अचानक,
जब उस छोटे से बचपन में थी मैं,
सिर्फ़ खेलना-कूदना ही काम था,
न कोई चिंता थी, न कोई बोझ था,
हर दिन बस खुशियों का नाम था,
अब देखो, सारे दिन करती हूँ काम,
जिम्मेदारियों में खुद को ढूँढती हूँ,
फिर से यादों का बचपन मुस्काता है,
मेरा गाँव आज भी मुझे बुलाता है।।

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