यूपी का रण : कई सवाल भी छोड़ गया है काशी का सियासी रण, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को ढूंढ़ने होंगे वाराणसी में उठे सवालों के जवाब

काशी की धरती ने भी अपना फैसला सुना दिया। इसके साथ ही मतदान संपन्न हो गया। पर, काशी में कुछ सवाल ऐसे भी गूंजे जिनका देर-सबेर भाजपा नेतृत्व को जवाब तलाशना ही होगा।  विकास, विरासत के काम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक के बाद एक प्रवास से भाजपा चुनाव जीत भी जाती है, तो भी इन सवालों का जवाब तलाशे बिना भविष्य में काशी की धरती पर भाजपा की विजय यात्रा को निर्बाध गति से जारी रखना असंभव नहीं, तो मुश्किलों भरा जरूर हो सकता है।

सवालों का जिक्र करने से पहले इसकी पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। देखा जाए तो 2014 में भाजपा की ओर से पेश प्रधानमंत्री पद  के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से काशी की पुरातन भाजपा ने नया चोला पहनना शुरू कर दिया था। इसका असर आगे आने वाले चुनावों में भी देखने को मिला। वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली नई भाजपा ने उत्तर प्रदेश के शेष इलाकों की तरह काशी की धरती पर भी जीत के लिए नई रणनीति का ताना-बाना बुना था। यहां की आठ सीटों में एक शहर उत्तरी सीट को छोड़कर शेष सभी सात सीटों पर पुराने चेहरे बदल दिए गए थे। यहां तक कि सात बार के विधायक श्यामदेव राय चौधरी तक का टिकट काटकर उनके स्थान पर नीलकंठ तिवारी जैसे नए चेहरे को मैदान में उतारा गया था। भाजपा के पूर्व मंत्री एवं जनसंघ के समय के नेता कई बार के विधायक हरिश्चंद्र श्रीवास्तव की पत्नी ज्योत्सना श्रीवास्तव जो खुद भी तीन बार विधायक रहीं, उनका भी टिकट बदलकर उनके पुत्र सौरभ श्रीवास्तव को लड़ाया गया था। यही प्रयोग भाजपा ने जिले की रोहनिया, पिंडरा और शिवपुर सीटांे पर भी किया था। जबकि, सहयोगी अपना दल (एस) के खाते में जाने की वजह से अजगरा व सेवापुरी सीट पर भाजपा नहीं लड़ी थी।

यही नहीं, नई भाजपा ने नया प्रयोग करते हुए काशी में अपने खाते की कुछ सीटों पर पार्टी काडर के पुराने कार्यकर्ताओं की जगह दूसरे दलों से आए नेताओं को तवज्जो देकर विधायक बनाया था। इनमें से कोई बसपा से भाजपा में आया था, तो कोई अन्य किसी दल से। यह प्रयोग सफल भी रहा और भाजपा गठबंधन सभी सीटों पर जीतने में कामयाब रहा। इनमें से तीन विधायकों-नीलकंठ तिवारी, रवींद्र जायसवाल और अनिल राजभर को प्रदेश सरकार में मंत्री भी बनाया गया। वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के सांसद चुने जाने और यहां के तीन विधायकों को प्रदेश सरकार में मंत्री बनाने के बाद यह माना जा रहा था कि अब आगे काशी की धरती पर होने वाले सियासी रण को फतह करने में भाजपा के सामने किसी तरह की चुनौती नहीं होगी। पर, विधानसभा चुनाव में चुनौती मिलती दिखी इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।

सवाल जो सहज ही उठ खड़े हुए
काशी में जिस तरह पीएम मोदी ने 2017 में भाजपा का झंडा फहराने के लिए जोर लगाया था, आखिर क्यों वैसा ही जोर इस चुनाव में भी लगाना पड़ा? वाराणसी समेत आसपास के जिलों में विकास कार्यों की लंबी लकीर खींचने के बावजूद अगर ऐसा करना पड़ा तो यह सवाल सहज ही उठ खड़ा होता है कि जिस काशी में 2017 के पहले बिना किसी विकास कार्य और बिना किसी लहर के श्यामदेव राय जैसे सरल व सामान्य नेता शहर दक्षिणी सीट से 7 बार जीत दर्ज करते हैं, उसी सीट पर मंत्री को जिताने के लिए पीएम को रोड शो क्यों करना पड़ा? जबकि, भाजपा अयोध्या के बाद वाराणसी को ही विकास और विरासत को सहेजने के मॉडल के रूप में पेश किया। यह विडंबना ही है कि पहले विधायक मिलकर सांसदों को जिताते थ्ाे आैर अब सांसद विधायकों को जिताने के लिए उतर रहे हैं।

शीतयुद्ध चलता रहा पर पदाधिकारी अनदेखी करते रहे
भाजपा के एक पूर्व प्रदेश पदाधिकारी कहते हैं, इसकी प्रमुख वजह जीत के निहितार्थों को ठीक से न समझ पाना या समझने में असफल रहना है। जीतने वालों को यह लगा कि पीएम मोदी पर जनविश्वास ने उनकी जीत सुनिश्चित की है, ऐसा था भी। पर, वे एक गलत धारणा पाल बैठे कि उन्हें कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। लिहाजा वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। अपने स्तर पर न तो उन्होंने जनता की जरूरतों को समझने की आवश्यकता समझी और न अपनी जवाबदेही महसूस की। दूसरी तरफ जिन विधायकों को मंत्री पद नहीं मिला, वे भी कहीं न कहीं अपनी असफलताओं का ठीकरा मंत्री बने विधायक साथियों पर फोड़ते रहे। मंत्री-विधायकों का शीतयुद्ध चलता रहा और पदाधिकारी अनदेखी करते रहे।

विधायकों पर जनता के भरोसे का सवाल बड़ा हो गया
जब चुनाव का बिगुल बजा और विपक्ष की तरफ से व्यूह रचना होने लगी तब जाकर भाजपा को एहसास हुआ कि उनके विधायकों के खिलाफ आम लोगों में नाराजगी है। विधायक जनता के भरोसे पर पूरी तरह से खरे नहीं उतर पाए हैं। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री को बतौर काशी के सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में जमीन पर उतरना पड़ा, ताकि वे अपने भरोसे की डोर से अपने संसदीय क्षेत्र के भाजपा उम्मीदवारों की जीत का रथ खींचकर अपनी और भाजपा की साख बचा सकें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *