सुप्रभात आत्मीय परिजनो एवं मित्रो सपरिवार।आज सम्पूर्ण वर्ष का सबसे बड़ा और महान दिन व पर्व गुरु पूर्णिमा है जिसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।कौन दावे के साथ कह सकता है 18 पुराणों और 54 उप पुराणों के रचनाकार महर्षि वेदव्यास जिनकी गणना 24 ब्रह्म के अवतारों में भी की जाती है आषाढ़ की पूर्णिमा को ही अवतरित हुए थे लेकिन आषाढ़ पूर्णिमा को उनकी जयन्ती की मान्यता प्राप्त है।शायद इसका कारण यह भी हो कि आषाढ़ यानिकि बर्षा ऋतु का पहला माह है और वर्षा ऋतु ही पृथ्वी अथवा मृत्यु लोक के सम्पूर्ण वर्ष की पोषक है क्योंकि जल ही जीवन है हालांकि यह बात भी मेरा कवि दावे के साथ नहीं कह सकता।और भगवान व्यासजी भी मेरे कवि की ही दृष्टि में नहीं वरन् सम्पूर्ण भारतीय वांग्मय में-
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्!
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।
अब आइए गुरु महिमा की ओर तो इस धरा धाम और संसार में गुरु के बिना कोई नहीं है।उदाहरण के लिए अरस्तू के गुरु प्लेटो हैं जबकि प्लेटो के गुरु सुकरात हैं और ये सभी दुनिया के शीर्षस्थ दार्शनिक हैं।इस देश और सनातन संस्कृति में कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् और रामचरितमानस के प्रारम्भ में ही गुरु शंकर रूपिणम् यद्यपि कृष्ण और शंकर के भी गुरु हैं।गुरु की कोई जाति भी नहीं क्योंकि बच्चे के प्रथम गुरु उसके मां-बाप यहां तक कि एक राजकुमारी और चित्तौड़गढ़ की ऐतिहासिक सुप्रसिद्ध महारानी मीरा के गुरु रविदास जी हैं जो दलित चमार जाति के हैं।चक्रवर्ती सम्राट से लेकर अपने जीवन में काशी के भिक्षुक संन्यासी तक रहे रससिद्ध महाकवि भर्तृहरि से इसीलिए लोगों ने पूछा भी होगा कि जगद्गुरु कृष्ण के गुरु सांदीपनि और शंकर के गुरु वृहस्पति देवताओं के गुरु यहां तक कि राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य आदि हैं तो इन गुरुओं का गुरु कौन है? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर भी उन्होंने अपने नीति शतकम् में दिया है-
विद्यानां नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
विद्या भोगकरी यश: सुखकरा विद्या गुरूणां गुरु:!
अर्थात् विद्या ही गुरुओं की गुरु है तो क्यों? शायद इसका कारण यह हो सकता है कि गुरु का सामान्य और साधारण अर्थ बड़ा,भारी और श्रेष्ठ होता है जो अपने से छोटे को संकटों-दुखों और कष्टों का हरण करता है यानि समस्याओं से शिष्य को मुक्ति दिलाने का दायित्व संभालता है(सिर्फ अपने विवेक व मन की बात) और विद्या भी सभी के लिए यही कार्य करती है इसीलिए विष्णु पुराण कहता है कि-
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये!
आयासायापरं कर्म विद्याSन्या शिल्पनैपुणम्।
-विष्णु पुराण 1/9/41
अर्थात् कर्म वही है जो बन्धनों में न जकड़े,विद्या वही है जो मुक्ति दे सके!कर्म आदमी को केवल थकाते हैं(सांसारिक कर्म) और इसीलिए विद्या भी केवल निपुणता का प्रदर्शन मात्र नहीं है।अर्थात् विद्या के अर्थ बहुत विशाल विराट और महान हैं।
गुरु का स्थान बहुत ही बड़ा और ऊंचा है इसलिए रामचरितमानस की पहली चौपाई-
बंदउं गुरु पद पदुम परागा
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा
से लेकर
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।
-कबीर
और-
अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्!
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नम;।
यहां तक कि-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:!
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।
जैसी बातें शास्त्रों में कही भी आ गई हैं।
-श्री हरि ऊं नमः शिवाय/अपने-अपने गुरु गोविंद की जय।

