गोरखपुर:खजनी तहसील में प्राइवेट मुंशियों का कब्ज़ा: सीएम केटी आदेश हवा में, फाइलों का फैसला ‘अनधिकृत लोगों के’ हाथ : जनता परेशान

खजनी तहसील में प्राइवेट मुंशियों का कब्ज़ा: सीएम केटी आदेश हवा में, फाइलों का फैसला ‘अनधिकृत लोगों के’ हाथ : जनता परेशान
संवाददात
गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्पष्ट निर्देश हैं कि सरकारी विभागों में निजी व्यक्तियों की नियुक्ति पूर्णतः प्रतिबंधित है। इसके बावजूद, गोरखपुर जनपद की खजनी तहसील में ये आदेश कागज़ों तक सीमित रह गए हैं। ज़मीनी स्तर पर यहाँ की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था एक ‘गैर-सरकारी सिस्टम’ के हवाले नजर आ रही है, जिसमें 40 से 50 प्राइवेट व्यक्ति बिना किसी वैधानिक पद या नियुक्ति के कार्य कर रहे हैं।

*प्रशासनिक नियंत्रण में निजी हस्तक्षेप*

तहसील परिसर में अनेक ऐसे प्राइवेट लोग हैं जो संवेदनशील पदों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं—जैसे माल बाबू, कानूनगो, नायब तहसीलदार, कंप्यूटर ऑपरेटर, यहां तक कि एसडीएम व तहसीलदार कोर्ट से संबंधित कार्यों में भी।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ प्रमुख नाम और पद इस प्रकार हैं:
• माल विभाग – सुरेंद्र यादव
• कानूनगो माल्हंपार – संतोष कुमार
• कानूनगो बारीगांव व सोनवर्षा ————
• आपदा प्रबंधन – अनिल कुमार (सूरज कुमार के स्थान पर)
• नायब तहसीलदार बेलघाट व सिकरीगंज – सुधई व बलिहारी मौर्य
• खजनी नायब तहसीलदार कार्यालय – जनार्दन मौर्य, गिरीश चंद्र शर्मा कार्यरत
• भदार खास कानूनगो – रामजतन,विजय कुमार सहित अन्य लोग रहतें हैं मौजूद

*कोर्ट में भी ‘ग़ैरसरकारी मदद*
सुत्रों के अनुसार, एसडीएम कोर्ट व तहसीलदार कोर्ट में 3 से 4 प्राइवेट व्यक्ति नियमित रूप से कार्य कर रहे हैं। उनकी भूमिका सिर्फ ‘मदद’ तक सीमित नहीं, बल्कि कोर्ट संबंधी दस्तावेज़ों की तैयारी और प्रशासनिक आदेशों तक फैली हुई है।

*फाइल स्पीड’ का खेल और आमजन की विवशता*

इन तथाकथित ‘बाबुओं’ की सत्ता और पकड़ इस हद तक है कि कई सरकारी कर्मचारी भी इनके सामने निर्णय लेने में संकोच करते हैं। आम नागरिकों को सलाह दी जाती है कि फाइलें तेज करवानी हैं तो ‘बाबू’ को चाय-पानी देना ज़रूरी है। यह नेटवर्क अब कथित रूप से फाइलों की गति के बदले ‘सुविधा शुल्क’ वसूलने तक पहुँच चुका है।

*कानून को ठेंगा, भ्रष्टाचार को सहारा*

यह पूरी व्यवस्था सीधे-सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जारी आदेशों की अवहेलना है। संवेदनशील जिम्मेदारियों को गैर-कानूनी तरीके से निजी हाथों में सौंपना शासन की पारदर्शिता और भरोसे पर गहरी चोट है। यह स्थिति राजनीतिक संरक्षण, भाई-भतीजावाद और प्रशासनिक लापरवाही की भी संकेत देती है।

*प्रशासन के लिए एक अग्निपरीक्षा*

अब सवाल उठता है:
• क्या जिला प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगा?
• क्या इन ‘प्राइवेट बाबुओं’ की भूमिका की जाँच कर ज़िम्मेदारी तय की जाएगी?
• या फिर, सरकारी आदेशों को यूँ ही ताक पर रख, प्रशासनिक कामकाज बाहरी लोगों के भरोसे चलता रहेगा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *