बिहार के ग्रामीण समाज में लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा की चुनौतियां
खुशनाज़ खातून
सीतामढ़ी, बिहार
हाल ही में बिहार में शिक्षा को लेकर एक सकारात्मक खबर सामने आई, जिसमें राज्य सरकार ने तकनीकी शिक्षा संस्थानों में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण और नए कॉलेजों की स्थापना जैसे कदमों को आगे बढ़ाया है। सरकार का दावा है कि अब छात्र-छात्राओं को अपने ही जिलों में पढ़ाई के बेहतर अवसर मिल रहे हैं और बाहर पलायन की आवश्यकता कम हो रही है। यह खबर उच्च, विशेषकर तकनीकी शिक्षा हासिल करने का ख्वाब देखने वाली ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों के लिए बहुत अहम है।
लेकिन इस सकारात्मक तस्वीर के पीछे एक कठोर सच्चाई भी छिपी है, क्योंकि ग्रामीण बिहार की अधिकांश लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि पहले की अपेक्षा यह चुनौती थोड़ी कम जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। दरअसल, यहां के ग्रामीण इलाकों में जब कोई लड़की किताब उठाती है, तो वह केवल अक्षर नहीं पढ़ती, बल्कि अपने भविष्य की कहानी भी खुद से लिखना चाहती है। वह डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर या सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखती है। लेकिन जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती है, परंपरा और रिवाज के नाम पर समाज की अदृश्य दीवारें उसके रास्ते में खड़ी होती जाती हैं। कई बार यह दीवारें इतनी मजबूत होती हैं कि उसके सपने उसी के गांव की सीमाओं में कैद होकर रह जाते हैं।
पिछले दस वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति मिश्रित दिखाई देती है। बिहार में महिला साक्षरता दर में वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी अभी भी सीमित है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 2015 के आसपास यह प्रतिशत लगभग 10–12 प्रतिशत था, जो धीरे-धीरे बढ़कर 2024-25 तक करीब 18–20 प्रतिशत तक पहुंचा है। हालांकि यह वृद्धि सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन राष्ट्रीय औसत की तुलना में यह अभी भी काफी कम है। इसका मतलब है कि बिहार में आज भी हर 10 ग्रामीण लड़कियों में से केवल 2 ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पा रही हैं।
इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण सामाजिक कुरीतियां हैं। ग्रामीण समाज में आज भी यह सोच गहराई से बैठी हुई है कि लड़की को ज्यादा पढ़ाने का कोई विशेष लाभ नहीं है, क्योंकि अंततः उसे विवाह के बाद घर-गृहस्थी संभालनी है। कई परिवारों में यह धारणा इतनी मजबूत है कि वे बेटी की पढ़ाई पर खर्च करने के बजाय उसकी शादी और दहेज के लिए पैसा जमा करना ज्यादा जरूरी समझते हैं। यही सोच लड़कियों के सपनों को धीरे-धीरे खत्म कर देती है।
बाल विवाह भी एक बड़ी बाधा है। बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है, जिससे उनकी शिक्षा बीच में ही रुक जाती है। एक लड़की जो कॉलेज जाना चाहती थी, वह अचानक घर और परिवार की जिम्मेदारियों में उलझ जाती है। इसके साथ ही, घरेलू कामकाज और छोटे भाई-बहनों की देखभाल की जिम्मेदारी भी अक्सर लड़कियों पर ही डाल दी जाती है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। शिक्षा तक पहुंच की समस्या भी कम गंभीर नहीं है। गांवों में उच्च शिक्षा संस्थानों की कमी, कॉलेजों की दूरी, सुरक्षित परिवहन का अभाव और सामाजिक सुरक्षा की चिंता, ये सभी कारण लड़कियों को आगे पढ़ने से रोकते हैं। कई परिवार अपनी बेटियों को इसलिए कॉलेज नहीं भेजते क्योंकि उन्हें रास्ते की सुरक्षा की चिंता होती है।
हालांकि बिहार सरकार ने इन समस्याओं को समझते हुए कई योजनाएं शुरू की हैं। ‘मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना’ के तहत जन्म से लेकर स्नातक तक लड़कियों को आर्थिक सहायता दी जाती है, जिसमें कुल मिलाकर लगभग 94,000 रुपये तक की मदद शामिल है। वहीं ‘मुख्यमंत्री बालिका (स्नातक) प्रोत्साहन योजना’ के तहत स्नातक पूरा करने पर 25,000 से 50,000 रुपये तक की राशि दी जाती है। इन योजनाओं का उद्देश्य लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना और माता पिता को पढ़ाई के लिए पैसे जोड़ने की चिंता से मुक्त करना है।
इससे स्कूल स्तर पर लड़कियों की उपस्थिति में काफी सुधार हुआ है और उच्च शिक्षा में भी धीरे-धीरे वृद्धि देखी जा रही है। पहले जहां उच्च शिक्षा में भागीदारी 10–12 प्रतिशत के आसपास थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 18–20 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। लेकिन यह वृद्धि अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं है, क्योंकि सामाजिक बाधाएं अब भी मजबूत बनी हुई हैं। वास्तव में, असल चुनौती केवल संसाधनों की कमी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सोच की कमी भी है। जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि लड़की की शिक्षा केवल उसका अधिकार नहीं, बल्कि पूरे समाज के विकास की नींव है, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा। एक शिक्षित लड़की आर्थिक रूप से सशक्त भी बनती है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।
इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार की योजनाओं के साथ-साथ समाज में जागरूकता को भी उतनी ही प्राथमिकता दी जाए। इसके लिए पंचायत स्तर पर शिक्षा को लेकर संवाद बढ़ाया जाए, सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, और सबसे महत्वपूर्ण लड़कियों की शिक्षा को सम्मान और अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाए। साथ ही, बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ सख्त सामाजिक और कानूनी कदम उठाए जाएं। सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि देश के हर ग्रामीण क्षेत्रों में हर लड़की को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह अपने सपनों को बिना डर और बिना रोक-टोक के जीये, और उसे ये अधिकार खैरात में नहीं बल्कि संविधान देता है।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

