
लंबे समय से राजनीतिक रूप से निष्क्रिय राज ठाकरे इधर अचानक से सक्रिय हो उठे और उनके साथ भारी संख्या में जनशक्ति दिखाई देने के कारण वह चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। उन्होंने मस्जिदों में लाउडस्पीकर से अजान रोकने और अवैध लाउडस्पीकर को हटाने की मांग करते हुए कहा था कि ऐसा नहीं हुआ, तो वह दोगुनी आवाज में जगह-जगह हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। नतीजा यह हुआ कि अब अवैध लाउडस्पीकर हट रहे हैं और जो हैं, उनकी आवाज कम की जा रही है।
हालांकि बाद में उन्होंने अपना रुख नरम करते हुए पत्रकार वार्ता में बताया कि यह सतत चलने वाला आंदोलन है और धार्मिक के बजाय सामाजिक विषय है। महाराष्ट्र की राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि वह लंबे समय तक सक्रिय रहने की योजना से बाहर निकले हैं। शरद पवार की अगुआई में महाविकास अघाड़ी की बैठक के बाद उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने कहा कि जो भी कानून हाथ में लेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। प्रश्न यही है कि कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई?
सांसद नवनीत राणा और उनके पति रवि राणा को केवल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के घर के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने की चुनौती देने पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार करने वाला महाराष्ट्र प्रशासन राज ठाकरे के संदर्भ में कुछ न कर सका। वास्तव में शिवसेना राज ठाकरे के विरुद्ध कार्रवाई करके उन्हें हिंदुत्व का हीरो नहीं बनने देना चाहती थी। ऐसा होने से शिवसेना के वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा मनसे के साथ जा सकता है। राज ठाकरे बनाम शिवसेना की यह लड़ाई 2006 से ही आरंभ हुई।
अभी तक शिवसेना उसमें जीत रही है। लेकिन महाविकास आघाड़ी में आने के बाद शिवसेना की चाल और चरित्र में जो अंतर आया है, उसके बाद कई प्रकार की संभावनाएं पैदा हुई हैं। एक तरफ शिवसेना हिंदुत्व आधारित वोट बैंक को बनाए भी रखना चाहती है, और दूसरी तरफ अपनी सरकार के साझेदारों को संदेश देना चाहती है कि सेक्यूलरिज्म के नाम पर उसकी निष्ठा अटूट है। इसमें खतरा यह है कि धीरे-धीरे हिंदुत्व विचारधारा के आधार पर खड़ा समर्थन कमजोर हो सकता है। इसलिए राज ठाकरे ने उपयुक्त समय जानकर चोट की है।
संभव है कि इसके लिए भाजपा ने उन्हें प्रोत्साहित किया हो। राज ठाकरे बयानबाजी कर रहे हैं कि शिवसेना हिंदुत्व आधारित पार्टी नहीं रही। अब सवाल यह है कि राज ठाकरे का राजनीतिक भविष्य क्या होगा। क्या भाजपा राज ठाकरे को इसलिए मजबूत करना चाहती है कि उनके साथ राजनीतिक साझेदारी होने का लाभ मिल सके? इन सारे प्रश्नों का उत्तर भविष्य के गर्भ में है। किंतु महाराष्ट्र की राजनीति में बदलाव होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। राज ठाकरे के साथ उमड़ा जनसमूह इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए अभी संभावनाएं मौजूद हैं।
अतीत का अनुभव बताता है कि राज ठाकरे की सभा में भीड़ तो जुटती रही, पर वह वोटों में तब्दील नहीं हो सकी। इसका कारण यही माना गया कि उनके पास चुनावी प्रबंधन करने वाले लोगों की कमी है। इसके अलावा मनसे की विचारधारा स्पष्ट नहीं रही। मनसे ने उत्तर भारतीयों का विरोध करके भूमि-पुत्र सिद्धांत को आगे बढ़ाया, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई। साथ ही, राज ठाकरे ने कभी सड़क पर उतर कर काम नहीं किया। मीडिया के साथ भी उनका कोई अच्छा व्यवहार नहीं था, इसलिए महाराष्ट्र की राजनीति में वह अलग-थलग पड़ गए। लेकिन इस समय की परिस्थितियां थोड़ी अलग हैं।
राज ठाकरे ने 2020 से अपनी पार्टी में बदलाव किया है। उन्होंने चार रंगों की जगह केसरिया झंडा अपना लिया है और उसमें छत्रपति शिवाजी के राज प्रतीक अंकित किए हैं। इस तरह उन्होंने मनसे को हिंदुत्व और मराठा स्वाभिमान से जोड़ा है। चूंकि अभी देश में हिंदुत्व की लहर है, इसलिए राज ठाकरे को समर्थन मिलना स्वभाविक है। किंतु उत्तर भारतीयों के विरुद्ध उनके अभियान को लेकर संदेह कायम है। लेकिन वह उत्तर भारतीयों की नाराजगी को दूर करने की कोशिश में भी लगे हैं। यदि भाजपा ने राज ठाकरे के साथ गठबंधन किया, तो उनका जनाधार मजबूत होगा और इसका नुकसान शिवसेना को होगा।

