(लखनऊ)आईएएस से इस्तीफे के बाद दिव्या मित्तल का सियासत में बड़ा कदम, बिना किसी पार्टी सिंबल के लड़ेंगी चुनाव

(लखनऊ)आईएएस से इस्तीफे के बाद दिव्या मित्तल का सियासत में बड़ा कदम, बिना किसी पार्टी सिंबल के लड़ेंगी चुनाव
लखनऊ ,29  सितंबर ,(आरएनएस)। प्रशासनिक सेवा से अचानक इस्तीफा देकर सबको चौंकाने वाली पूर्व चर्चित आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने राजनीति में उतरने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। सोशल मीडिया पर एक भावुक और तीखा वीडियो संदेश जारी करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी राजनीतिक दल या झंडे के नीचे नहीं, बल्कि सीधे आम जनता के साथ मिलकर ‘इरादे और न्याय की राजनीतिÓ करेंगी। उन्होंने कहा कि उनका मकसद किसी सत्ता की सीढ़ी चढ़ना नहीं, बल्कि उन वंचितों की आवाज बनना है जिनकी फरियाद सरकारी दफ्तरों तक नहीं पहुंच पाती।
‘मुझे देश की आजादी के 80 सालों का हिसाब चाहिएÓ
दिव्या मित्तल ने वीडियो में अपने इस्तीफे के पीछे की असली वजह और भविष्य की योजनाएं साझा करते हुए सीधे सिस्टम पर तीखे सवाल दागे। उन्होंने कहा कि लोग पूछते थे कि अफसर बनने के बाद अब क्या बनना चाहती हैं, तो उनका जवाब है कि वे उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं जिन्हें अनसुना कर दिया गया। उन्होंने कहा, जिन झंडों के नीचे 80 सालों में हालात नहीं बदले, उन झंडों के नीचे खड़े होकर इंसाफ नहीं मांगा जा सकता। जो हिस्सा बन जाए, वह हिसाब नहीं मांग सकता। इसलिए मैं राजनीति किसी दल के साथ नहीं, केवल जनता के साथ करूंगी।
सिस्टम की बेरुखी और भ्रष्टाचार के खोले कई राज
पूर्व आईएएस ने फील्ड पोस्टिंग के दौरान झेले गए दर्दनाक अनुभवों को साझा करते हुए नौकरशाही और राजनीतिक दखलअंदाजी की पोल खोली। मिर्जापुर के लहुरिया दह का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जिस पहाड़ी गांव में पानी नहीं था, वहां की एक महिला ने उनसे सिर्फ 5वीं से आगे स्कूल मांगा था। उन्होंने स्कूल स्वीकृत कराया, लेकिन तीन साल बाद भी वह नहीं बन सका क्योंकि सिस्टम में ‘इरादे की कमीÓ थी। इसके अलावा, राजस्व विभाग में तैनाती के दौरान एक भूमिहीन व्यक्ति के पट्टे की जमीन पर ‘ऊपर के आदेशÓ का हवाला देकर कब्जा न दिलाए जाने की लाचारी बयां करते हुए उन्होंने सवाल किया कि जब संविधान में सबसे ऊपर जनता है, तो फिर यह ‘ऊपरÓ कौन बैठा है?
गड्ढों में गिरती जिंदगी, पेपर लीक और ्रढ्ढ के दौर में युवाओं की चिंता
दिव्या मित्तल ने सड़कों के गड्ढों, पुल न होने से टापू बनते गांवों और व्यवस्था की लापरवाही से होने वाली मौतों को ‘हादसा नहीं, फैसलाÓ करार दिया। युवाओं और छात्रों के दर्द को उठाते हुए उन्होंने कहा कि रात-रात भर पढ़ने वाले नौजवान पेपर लीक और अदालती मुकदमों में 5-5 साल बर्बाद कर रहे हैं। माता-पिता जमीन-जेवर गिरवी रखकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बदलती दुनिया के बीच उनका भविष्य सुरक्षित है या नहीं, इस पर संसद या विधानसभाओं में कोई सार्थक चर्चा नहीं हो रही है।
उत्तर प्रदेश से होगी शुरुआत, मिर्जापुर से ताल ठोकने की चर्चा
अपनी कर्मभूमि उत्तर प्रदेश को बदलाव का केंद्र बताते हुए दिव्या ने कहा कि 1857 की क्रांति से लेकर अब तक यूपी ने हमेशा देश को नई राह दिखाई है। उन्होंने देवरिया में चलाए गए ‘ऑपरेशन कब्जा मुक्तिÓ का उदाहरण देते हुए कहा कि जब जनता साथ आती है तो बड़े-बड़े काम मुमकिन हो जाते हैं। किसी पार्टी के साथ गुप्त मुलाकात के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने स्वतंत्र रूप से जनता के बीच जाने का संकल्प दोहराया है। राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि अपनी लोकप्रिय प्रशासनिक छवि के चलते वे मिर्जापुर संसदीय या विधानसभा क्षेत्र से सीधे चुनावी मैदान में उतर सकती हैं।
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