सावन की बारिश में नदी क्यों बन जाती हैं गांव की सड़कें?
पुनीता कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार
सावन की बारिश खेतों के लिए उम्मीद लेकर आती है, लेकिन बिहार के कई गांवों में यही बारिश सड़कों के लिए आफत बन जाती है। रातभर हुई बारिश के बाद सुबह जब गांव की कच्ची सड़क पर निकलना हो तो सबसे पहले यह तय करना पड़ता है कि पैर कहां रखा जाए। कहीं घुटनों तक कीचड़ है, कहीं सड़क पर पानी जमा है और कहीं मिट्टी इतनी धंस चुकी है कि साइकिल और मोटरसाइकिल का निकलना मुश्किल है।
जिस रास्ते से रोज स्कूल जाने वाली बच्चे, किशोरियां, मजदूर, किसान और बुजुर्ग गुजरते हैं, वही रास्ता सावन में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा लेने लगता है। बारिश रुक जाने के बाद भी परेशानी खत्म नहीं होती, क्योंकि कीचड़ और जलजमाव कई दिनों तक रास्ता रोककर रखते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गांव में सड़क बनी या नहीं, सवाल यह है कि क्या सड़क ऐसी होनी चाहिए जो बारिश के मौसम में भी गांव को बाकी दुनिया से संपर्क तोड़ दे?
बिहार के ग्रामीण इलाकों में सड़क का अर्थ शहरों की तरह केवल आवागमन की सुविधा का नाम नहीं है बल्कि यह लाइफ लाइन होती है. इसलिए सड़क खराब होने का असर जीवन के अलग-अलग हिस्सों पर एक साथ पड़ता है। सावन में यह असर कई गुना बढ़ जाता है। कच्ची सड़क पर पानी पड़ते ही उसकी सतह कमजोर होती है और भारी वाहनों के गुजरने से गड्ढे गहरे होते जाते हैं। कई जगह सड़क और खेत के बीच का फर्क मिट जाता है।
रास्ते की खराब स्थिति का असर स्कूल जाने वाले बच्चों की नियमित उपस्थिति पर पड़ता है। किशोरियों के लिए यह समस्या और जटिल हो जाती है। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए अक्सर उन्हें गांव से बाहर जाना पड़ता है। यदि बारिश में रास्ता असुरक्षित या दुर्गम हो जाए और सार्वजनिक परिवहन भी नियमित न हो, तो परिवारों की चिंता बढ़ती है। पढ़ाई जारी रखने का फैसला केवल स्कूल की उपलब्धता से तय नहीं होता है बल्कि स्कूल तक पहुंचने का रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सड़क की खराब स्थिति का बोझ गरीब परिवारों पर सबसे अधिक पड़ता है। जिनके पास निजी वाहन है, वे खराब रास्ते के बावजूद किसी दूसरे मार्ग का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन दिहाड़ी मजदूर के पास हर दिन अतिरिक्त किराया देने की क्षमता नहीं होती। किसान के लिए खराब सड़क का अर्थ बाजार तक पहुंचने में अधिक समय और परिवहन लागत हो सकता है। छोटी जोत वाले किसान या सीमित आय वाले परिवार के लिए यह अतिरिक्त खर्च मामूली नहीं होता। इस तरह सड़क की समस्या आर्थिक असमानता को और गहरा कर सकती है। एक ही बारिश किसी सम्पन्न परिवार के लिए कुछ घंटे की परेशानी हो सकती है, जबकि गरीब परिवार के लिए वह काम छूटने, इलाज टलने या बच्चों के स्कूल न पहुंच पाने का कारण बन सकती है।
हालाँकि पिछले कुछ दशकों में बिहार में ग्रामीण सड़कों को बेहतर बनाने में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। केंद्र सरकार द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 16 जुलाई 2026 तक बिहार में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के विभिन्न चरणों के तहत 62,724 किमी सड़क का निर्माण पूरा हो चुका था और 31,293 बस्तियों को जोड़ा जा चुका था। यह आंकड़ा बताता है कि ग्रामीण संपर्क के विस्तार में बड़ा काम हुआ है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि काम अभी खत्म नहीं हुआ है। इसलिए अगले चरण में नई सड़कें बनाने के साथ पुरानी सड़कों की मजबूती और नियमित रखरखाव को बराबर महत्व देना होगा।
किसी सड़क की सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि वह साल के बारह महीने कितनी उपयोगी रहती है। खासकर बिहार जैसे राज्य में, जहां मानसून के दौरान भारी बारिश और जलजमाव ग्रामीण जीवन को प्रभावित करते हैं, सड़क निर्माण में जल निकासी को मूल डिजाइन का हिस्सा बनाना जरूरी है। कई ग्रामीण सड़कों की समस्या केवल मिट्टी या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि पानी की निकासी के रास्ते न होने से भी बढ़ती है। सड़क के दोनों ओर नालियां, पर्याप्त पुलिया, कल्वर्ट और पानी के प्राकृतिक बहाव के अनुरूप डिजाइन को अनिवार्य मानक बनाया जाना चाहिए। सड़क बनाने के बाद उसकी गुणवत्ता जांच केवल निर्माण पूरा होने के समय नहीं, बल्कि कम से कम एक मानसून गुजरने के बाद भी होनी चाहिए।
वास्तव में, केवल सड़क बना देना ही समस्या का समाधान नहीं है। गांव की सड़कें तभी सफल मानी जानी चाहिए जब बारिश के दिनों में भी वह लोगों को उनके जरूरी गंतव्य तक पहुंचाने में सक्षम रहे। लेकिन इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि जिन सड़कों का निर्माण हो चुका है, उनकी हालत बरसात में कैसी रहती है और ऐसी कौन-सी बस्तियां अभी भी बाकी हैं, जो हर मौसम में चलने योग्य सड़क से वंचित हैं।
(यह लेखि
का की निजी राय है)

