योजनाओं के लाभ से क्यों छूट जाते हैं जरूरतमंद?
शाना
लूणकरणसर, राजस्थान
किसी गांव की तरक्की का आकलन केवल इस बात से नहीं किया जा सकता कि वहां कितनी सरकारी योजनाएं पहुंची हैं। असली सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं का लाभ उन लोगों तक कितना पहुंचा, जिनके लिए इसे बनाया गया है। राजस्थान के लूणकरणसर से करीब 20 किमी दूर स्थित कुजटी गांव इस सवाल को गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर करता है।
करीब 2500 की आबादी और लगभग 400 घरों वाले इस गांव में सरकार की कई योजनाएं संचालित हैं, लेकिन उनका लाभ हर परिवार तक एक समान नहीं पहुंच पा रहा है। किसी परिवार को समय पर राशन नहीं मिलता, किसी किसान को आर्थिक सहायता के लिए इंतजार करना पड़ता है, किसी किशोरी को छात्रवृत्ति की जानकारी तक नहीं मिलती और किसी बुजुर्ग को अपनी ही जिंदगी का सरकारी रिकॉर्ड ठीक कराने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। योजनाओं की मौजूदगी और उनके वास्तविक लाभ के बीच यही दूरी ग्रामीण गरीबों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।
कुजटी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझे बिना इस समस्या की गंभीरता को समझना मुश्किल है। 2011 की जनगणना के अनुसार गांव में पुरुष साक्षरता करीब 72 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं की साक्षरता केवल 40 प्रतिशत है। गांव में 12वीं तक का स्कूल है, लेकिन शिक्षा की सुविधा उपलब्ध होना और हर बच्चे, विशेषकर हर किशोरी तक शिक्षा से जुड़ी सुविधाओं का लाभ पहुंचना दो अलग-अलग बातें हैं। गांव में बड़ी संख्या में परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करते हैं। ऐसे परिवारों के लिए सरकारी राशन केवल एक योजना नहीं, बल्कि घर के चूल्हे को जलाए रखने का महत्वपूर्ण सहारा है। जब राशन समय पर नहीं मिलता, तो इसका असर सीधे परिवार की रसोई और उसके सीमित बजट पर पड़ता है। गरीब परिवार के सामने तब दो ही रास्ते बचते हैं, या तो उधार लेकर भोजन की व्यवस्था करें या फिर अपनी दूसरी जरूरी जरूरतों में कटौती करे।
गांव के अधिकतर परिवारों को सरकारी राशन मिल रहा है, लेकिन कुछ परिवार आज भी इसके इंतजार में हैं। यह अंतर केवल सुविधा के बटवारे का नहीं है। जिस परिवार के पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है, उसके लिए कुछ किलो अनाज की कीमत भी बहुत बड़ी होती है। राशन व्यवस्था में नाम दर्ज होने, दस्तावेजों के मिलान, अंगूठे के निशान या तकनीकी प्रक्रिया में आई किसी समस्या का बोझ आखिरकार उसी व्यक्ति पर पड़ता है, जिसके पास समस्या का समाधान कराने के लिए न पर्याप्त जानकारी होती है और न ही पर्याप्त संसाधन। गांव से 20 किमी दूर लूणकरणसर ब्लॉक के सरकारी कार्यालय तक पहुंचना अपने आप में समय और पैसे की मांग करता है। दैनिक मजदूरी करने वाले परिवार के लिए कार्यालय के एक चक्कर का अर्थ उस दिन की कमाई का नुकसान भी होता है।
कुजटी की 75 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला की स्थिति इस व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने रखती है। अंगूठे का निशान मैच नहीं होने के कारण सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। हालांकि वह जीवित हैं, लेकिन सरकारी कागज उन्हें जीवित नहीं मानता। अब वह खुद को जीवित साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। यह घटना केवल तकनीकी खामी का मामला नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी बुजुर्ग महिला के सामने सरकारी रिकॉर्ड और उसकी वास्तविक जिंदगी में विरोधाभास पैदा हो जाए, तो उसे अपनी बात साबित करने के लिए कितने दरवाजे खटखटाने पड़ेंगे?
उम्र, आर्थिक निर्भरता, कम साक्षरता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता जब एक साथ किसी व्यक्ति के सामने खड़ी हो जाएं, तो सरकारी व्यवस्था तक पहुंच और भी कठिन हो जाती है। जिस व्यवस्था का उद्देश्य बुजुर्गों को सुरक्षा देना है, वही व्यवस्था अगर उन्हें अपनी पहचान और अस्तित्व साबित करने के लिए मजबूर करे, तो उसके काम करने के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही स्थिति गांव की किशोरियों के मामले में भी दिखाई देती है।
इस गांव की ऐसी बहुत-सी किशोरियां हैं जिन्हें आज तक किसी छात्रवृत्ति का लाभ नहीं मिल सका। समस्या केवल यह नहीं कि उन्हें छात्रवृत्ति नहीं मिली, बल्कि यह भी है कि उन्हें इसकी जानकारी देने वाला कोई प्रभावी माध्यम नहीं है। छात्रवृत्ति जैसी सहायता ऐसे परिवारों के लिए पढ़ाई जारी रखने का महत्वपूर्ण माध्यम होती है। लेकिन योजना की जानकारी ही न हो, आवेदन की प्रक्रिया समझ में न आए या आवश्यक दस्तावेजों की व्यवस्था न हो सके, तो कागज पर मौजूद अवसर वास्तविक जीवन में बदल नहीं बन पाता है।
बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी योजनाएं, महिलाओं के लिए सहायता, बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा और गरीब परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा, इन सभी का उद्देश्य ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को कम करना है। लेकिन जब इन योजनाओं तक पहुंच, व्यक्ति की जानकारी, दस्तावेज, तकनीकी प्रक्रिया या कार्यालयों के चक्कर पर निर्भर हो जाती है, तब सबसे अधिक नुकसान उन्हीं लोगों को होता है जो पहले से सबसे कमजोर स्थिति में हैं।
इसलिए सवाल केवल योजनाओं की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि उनकी अंतिम छोर तक पहुंच सुनिश्चित करने का है। एक ओर सरकार गरीबों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं, किशोरियों, बच्चों और बुजुर्गों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए योजनाएं बना रही है, दूसरी ओर जब उन्हीं योजनाओं का लाभ पाने के लिए कुछ लोग इंतजार और भागदौड़ के बीच फंसे हुए हों तब विकास की तस्वीर अधूरी दिखाई देती है।
दरअसल, सरकारी योजनाओं का उद्देश्य केवल लाभ बांटना नहीं, बल्कि लोगों को सम्मानजनक जीवन का अवसर देना है। इसलिए जरूरी है कि योजना बनने से लेकर उसके लाभ मिलने तक की पूरी प्रक्रिया को उसी व्यक्ति की नजर से देखा जाए, जिसके पास न पर्याप्त पैसा है, न प्रभाव और न ही प्रशासनिक प्रक्रियाओं की गहरी समझ। अगर किसी जरूरतमंद तक उसका अधिकार पहुंचाने के लिए उसे बार-बार अपनी गरीबी, अपनी पहचान या अपनी जरूरत साबित करनी पड़े, तो फिर सवाल सिर्फ व्यवस्था की खामी पर ही नहीं, बल्कि विकास के उस मॉडल पर भी उठता है, जिसे ज़मीनी हकीकत जाने बिना तैयार किया जाता है. ज़रूरत इस बात की है कि मॉडल ऐसा तैयार किया जाए तो समाज के उस इंसान तक खुद-ब-खुद पहुंचे, जिनकी पहुंच उस मॉडल तक नहीं हो पाती है.
(यह
लेखिका की निजी राय है)

