पाषाण उपकरणों से धातु युग तक मानव विकास और धरोहर संरक्षण के कानूनों पर विशेषज्ञों ने दी जानकारी

पाषाण उपकरणों से धातु युग तक मानव विकास और धरोहर संरक्षण के कानूनों पर विशेषज्ञों ने दी जानकारी
लखनऊ, (आरएनएस )। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय द्वारा आयोजित पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के तृतीय दिवस पर मानव सभ्यता के विकास और पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर दो व्याख्यान आयोजित किए गए। कार्यक्रम में करीब 100 प्रतिभागियों ने प्रत्यक्ष तथा 50 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की।प्रथम सत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार ने ‘पाषाण उपकरणों से धातु तक : प्रागैतिहासिक संस्कृतियों का विकास’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने मानव सभ्यता के प्रारंभिक विकास और प्रागैतिहासिक संस्कृतियों की क्रमिक यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला।
प्रो. अनिल कुमार ने पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण और ताम्रपाषाण काल से लेकर धातु युग तक मानव जीवन में आए तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक बदलावों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पाषाण उपकरणों से शुरू हुई मानव की तकनीकी यात्रा ने आखेटक एवं खाद्य-संग्राहक जीवन से कृषि, पशुपालन, स्थायी निवास, मृद्भांड निर्माण और धातुओं के प्रयोग तक मानव समाज को पहुंचाया।उन्होंने कहा कि कांस्य और लौह के प्रयोग से उत्पादन, कृषि, शिल्प और सामाजिक संगठन को नई गति मिली। पाषाण से धातु तक का विकासक्रम मानव की बुद्धि, कौशल, नवाचार और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण है।द्वितीय सत्र में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद इंदु प्रकाश ने ‘प्राचीन धरोहर कानून : स्मारकों एवं स्थलों के लिए कानूनी प्रावधान’ विषय पर प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की जानकारी देते हुए विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 49 और अनुच्छेद 51(एफ) का उल्लेख किया।उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है। उन्होंने प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904, प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 तथा पुरावशेष एवं कला निधि अधिनियम, 1972 सहित प्रमुख कानूनों की जानकारी दी।इंदु प्रकाश ने संरक्षित स्मारकों एवं पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा, उत्खनन के नियमन, पुरावशेषों के संरक्षण तथा उनकी चोरी और तस्करी की रोकथाम से संबंधित कानूनी प्रावधानों पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय महत्व के संरक्षित स्मारकों के निषिद्ध और विनियमित क्षेत्रों में अनधिकृत निर्माण तथा पुरावशेषों एवं कला निधियों के अवैध निर्यात सहित कानूनों का उल्लंघन दंडनीय अपराध है।उन्होंने कहा कि धरोहरों के संरक्षण के लिए कानूनों का प्रभावी और सख्त अनुपालन तथा जनसहभागिता आवश्यक है। सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी भी है।दोनों विशेषज्ञ वक्ताओं का निदेशालय की निदेशक रेनू द्विवेदी ने पौधा और स्मृति-चिह्न प्रदान कर स्वागत एवं सम्मान किया। कार्यक्रम के अंत में निदेशक ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव ने किया।इस अवसर पर विभाग के बलिहारी सेठ, अभयराज सिंह, अनिल सिंह, संतोष कुमार सिंह, आशीष, अकील, अभिषेक, अनिल, दरियाब, लवकुश सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी और प्रतिभागी मौजूद रहे।

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किशोर न्याय अधिनियम के दस वर्ष पूरे, बाल संरक्षण व्यवस्था की समीक्षा के लिए लखनऊ में राज्य स्तरीय परामर्श आयोजित
लखनऊ, (आरएनएस )। किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की किशोर न्याय समिति द्वारा महिला एवं बाल विकास विभाग, उत्तर प्रदेश तथा यूनिसेफ, लखनऊ के सहयोग से न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, उत्तर प्रदेश में एक दिवसीय ‘राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श-2026’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बाल संरक्षण, पुनर्वास, पुनर्समेकन और बच्चों के अधिकारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर मंथन किया गया।नालंदा सभागार में आयोजित उद्घाटन सत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एवं जेटीआरआई के पदेन मुख्य संरक्षक न्यायमूर्ति अरुण भंसाली, वरिष्ठ न्यायाधीश एवं जेटीआरआई की पर्यवेक्षण समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति राजन रॉय तथा उच्च न्यायालय किशोर न्याय समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अजय भनोट मौजूद रहे। महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी और संबंधित हितधारकों ने भी सहभागिता की।मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति अरुण भंसाली ने कहा कि बच्चों का संरक्षण राज्य और समाज दोनों की वैधानिक एवं नैतिक जिम्मेदारी है। किशोर न्याय अधिनियम के दस वर्ष पूरे होना केवल उपलब्धियों को रेखांकित करने का अवसर नहीं, बल्कि यह ईमानदारी से मूल्यांकन करने का भी समय है कि कानून बच्चों के जीवन में वास्तविक और सार्थक बदलाव लाने में कितना सफल रहा है।उन्होंने बच्चों के सर्वोत्तम हित, गरिमा, पुनर्वास और पुनर्समेकन को किशोर न्याय व्यवस्था का केंद्र बताते हुए किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समितियों, बाल देखरेख संस्थानों, डिजिटल दत्तक ग्रहण प्रक्रिया और मजबूत निगरानी तंत्र के माध्यम से हुई संस्थागत प्रगति का उल्लेख किया।न्यायमूर्ति राजन रॉय ने भारत में किशोर न्याय व्यवस्था के विकास की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि युवा अपराधियों के लिए पृथक व्यवस्था से वर्तमान व्यापक बाल संरक्षण प्रणाली तक महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। उन्होंने किशोर न्याय अधिनियम, 1960, किशोर न्याय अधिनियम, 1986, बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1989, किशोर न्याय अधिनियम, 2000 और किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 को इस विकास यात्रा के प्रमुख पड़ाव बताया।उन्होंने कहा कि किशोर न्याय व्यवस्था की सफलता का मूल्यांकन केवल निस्तारित मामलों की संख्या से नहीं होना चाहिए, बल्कि यह देखना जरूरी है कि कितने बच्चों को संरक्षण, पुनर्वास, गरिमा और बेहतर भविष्य के साथ जीवन जीने का अवसर मिला।किशोर न्याय समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अजय भनोट ने जमानत और बाल संरक्षण से जुड़े मामलों में बाल-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी बच्चे को उसके माता-पिता के जेल में होने के कारण दंडित नहीं किया जाना चाहिए। कानून की सीमाओं के भीतर न्यायिक विवेक का प्रयोग बच्चों के अधिकारों और कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।उन्होंने पुनर्वास और पुनर्समेकन को समग्र शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बताते हुए बौद्धिक विकास के साथ चरित्र निर्माण, शारीरिक स्वास्थ्य, योग, ध्यान और बागवानी जैसी व्यावहारिक गतिविधियों को भी इसमें शामिल करने की आवश्यकता बताई।महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी ने बाल संरक्षण के क्षेत्र में पिछले एक दशक में हुए सुधारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बाल संरक्षण तंत्र को और मजबूत करने तथा बच्चों के अधिकारों, कल्याण और सर्वोत्तम हितों की रक्षा के लिए किए जा रहे उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया।कार्यक्रम के दौरान ‘उड़ान’ पुस्तक के तृतीय संस्करण का विमोचन भी किया गया। मुख्य न्यायाधीश ने लखनऊ स्थित ‘दृष्टि’ सामाजिक संस्था के विशेष रूप से सक्षम बच्चों को आशीर्वाद दिया। गणमान्य अतिथियों ने बच्चों को उपहार भी वितरित किए।जेटीआरआई की निदेशक रेखा अग्निहोत्री ने मुख्य अतिथि और अन्य गणमान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए परामर्श के विषय की प्रासंगिकता और महत्व पर प्रकाश डाला। उद्घाटन सत्र का समापन यूनिसेफ के अधिकारी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन संस्थान के उप निदेशकों ने किया।दिनभर चले परामर्श सत्रों में उत्तर प्रदेश के जिला न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश, किशोर न्याय बोर्डों के प्रधान मजिस्ट्रेट सहित विभिन्न हितधारकों ने भाग लिया। पुलिस, लोक प्रशासन, परिवीक्षा विभाग तथा किशोर न्याय अधिनियम के क्रियान्वयन से जुड़े विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों ने भी सहभागिता की।

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पीएम पोषण रसोइयों के सम्मान और कैशलेस चिकित्सा कार्ड वितरण का राज्य स्तरीय समारोह आज, 1500 रसोइए होंगे शामिल
लखनऊ, (आरएनएस )। विद्यालयों में बच्चों के लिए प्रतिदिन भोजन तैयार कर उनके पोषण और स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले पीएम पोषण योजना के रसोइयों को सम्मान और सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए योगी सरकार की ओर से विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। 23 अगस्त को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान, लखनऊ के जुपिटर सभागार में रसोइया सम्मान समारोह एवं कैशलेस चिकित्सा कार्ड वितरण कार्यक्रम आयोजित होगा।बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह ने कहा कि पीएम पोषण योजना के रसोइए बच्चों के पोषण और स्वस्थ भविष्य की आधारशिला हैं। योगी सरकार उनके सम्मान, सुविधा और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में प्रस्तावित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में मंच पर 11 रसोइयों को सम्मानित किया जाएगा, जबकि प्रदेश के विभिन्न जनपदों से करीब 1500 रसोइयों की सहभागिता सुनिश्चित की जा रही है। राज्य स्तरीय आयोजन के साथ ही जनपद और तहसील स्तर पर भी रसोइया सम्मान समारोह आयोजित किए जाएंगे।इन कार्यक्रमों में सांसद, मंत्री, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष और अन्य जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। संबंधित अधिकारियों को कार्यक्रमों की सभी व्यवस्थाएं समयबद्ध ढंग से पूरी करने और आपसी समन्वय के साथ आयोजन को सफल बनाने के निर्देश दिए गए हैं।महानिदेशक, स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक मोनिका रानी के निर्देशों के तहत कार्यक्रम की तैयारियां की जा रही हैं। राज्य स्तरीय समारोह में प्रदेश के राजकीय, परिषदीय और अशासकीय सहायता प्राप्त प्राथमिक, उच्च प्राथमिक तथा कम्पोजिट विद्यालयों में पीएम पोषण योजना के तहत कार्यरत रसोइयों की सहभागिता सुनिश्चित की जा रही है।रसोइयों को कैशलेस चिकित्सा कार्ड उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा भोजन तैयार करते समय स्वच्छता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रसोइयों को हेड कवर, ग्लव्स और एप्रन किट उपलब्ध कराने की भी तैयारी है।कार्यक्रम में पीएम पोषण योजना की उपलब्धियों और रसोइयों के योगदान पर आधारित लघु फिल्म प्रदर्शित की जाएगी। योजना की उपलब्धियों को बुकलेट, पोस्टर और फ्लेक्स के माध्यम से भी प्रदर्शित किया जाएगा।सरकार का उद्देश्य पीएम पोषण योजना के माध्यम से बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ भोजन तैयार करने वाले रसोइयों के श्रम, योगदान और सेवाओं को सम्मान देना तथा उनके लिए स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संबंधी सुविधाओं को मजबूत करना है।

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बेसिक मेडिकल साइंसेज में एकीकृत अनुसंधान से क्लीनिकल उत्कृष्टता को बढ़ावा देने पर मंथन, बायोमेडिका-2026 का पहला दिन संपन्न
लखनऊ,(आरएनएस )। बेसिक मेडिकल साइंसेज में अनुसंधान पर क्लीनिकल साइंटिस्ट्स के 7वें राष्ट्रीय सम्मेलन ‘बायोमेडिका-2026’ का पहला दिन शनिवार को जानकीपुरम विस्तार स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय के न्यू कैंपस के इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज के सभागार में आयोजित हुआ। दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन नेशनल एम.एससी. मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन के तत्वावधान में इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज, लखनऊ विश्वविद्यालय के सहयोग से किया जा रहा है। सम्मेलन का मुख्य विषय ‘बेसिक मेडिकल साइंसेज में एकीकृत अनुसंधान के माध्यम से क्लीनिकल उत्कृष्टता को बढ़ावा देना’ है।लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जय प्रकाश सैनी के नेतृत्व में आयोजित सम्मेलन में देशभर से आए विशेषज्ञों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज के निदेशक एवं आयोजन अध्यक्ष प्रोफेसर पुष्पेंद्र कुमार त्रिपाठी ने सम्मेलन के वैज्ञानिक एवं आयोजन संबंधी पक्षों का समन्वय किया, जबकि एनएमएमटीए के आयोजन सचिव डॉ. सुखेस मुखर्जी ने दिनभर के कार्यक्रमों का संचालन एवं समन्वय किया।उद्घाटन सत्र में प्रोफेसर पुष्पेंद्र कुमार त्रिपाठी ने बेसिक मेडिकल साइंसेज में एकीकृत अनुसंधान की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मूलभूत चिकित्सा विज्ञान और क्लीनिकल प्रथाओं के बीच बेहतर समन्वय से चिकित्सा क्षेत्र में नए अनुसंधान एवं उपचार के रास्ते खुल सकते हैं। विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर एस.पी. सिंह, डीन, फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी ने अंतःविषय अनुसंधान को समय की आवश्यकता बताया। एरा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अब्बास अली मेहदी ने भी सम्मेलन को संबोधित किया।उद्घाटन सत्र के बाद एनएमएमटीए के संस्थापक अध्यक्ष प्रोफेसर श्रीधर राव पीएन ने प्रतिनिधियों को ‘एएमआर इंडिया प्रोजेक्ट’ की जानकारी दी। उन्होंने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से संबंधित अनुसंधान में इस परियोजना की उपयोगिता और महत्व पर चर्चा की। इसके बाद इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरोसाइंसेज के अध्यक्ष प्रोफेसर वी.एन. खन्ना ने ‘अनुसंधान कदाचारः प्रकार, कारण और परिणाम’ विषय पर व्याख्यान दिया।सम्मेलन के पहले दिन मौखिक शोध प्रस्तुतियों और पोस्टर प्रस्तुतियों के सत्र भी आयोजित किए गए। इनमें विभिन्न संस्थानों से आए शोधकर्ताओं और प्रतिनिधियों ने बेसिक एवं क्लीनिकल मेडिकल साइंसेज से संबंधित अपने मौलिक शोध कार्य प्रस्तुत किए। विशेषज्ञों ने शोध की गुणवत्ता, अनुसंधान पद्धति और चिकित्सा क्षेत्र में शोध के व्यावहारिक उपयोग पर भी विचार-विमर्श किया।सम्मेलन का दूसरा एवं अंतिम दिन 23 अगस्त 2026 को आयोजित किया जाएगा। इसमें विभिन्न विषयों पर प्लेनरी व्याख्यान, मुख्य व्याख्यान, सर्वश्रेष्ठ पीएचडी शोध प्रबंध पुरस्कार तथा निदान एवं उपचार के भविष्य को लेकर पैनल चर्चा आयोजित की जाएगी।

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जैविक खेती से आत्मनिर्भरता की राह दिखा रहे प्रतापगढ़ के युवा कृषक उत्कृष्ट पाण्डेय, प्रतिवर्ष 10 से 12 लाख रुपये की आय
लखनऊ, (आरएनएस )। प्रदेश सरकार द्वारा धारणीय कृषि, मृदा स्वास्थ्य संवर्धन, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आर्थिक समृद्धि के उद्देश्य से जैविक एवं प्राकृतिक खेती को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने तथा पारंपरिक एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विभिन्न योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। इन प्रयासों से प्रदेश में सुरक्षित एवं विषमुक्त खाद्यान्न उत्पादन के साथ कृषि लागत कम करने की दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।
इसी क्रम में प्रतापगढ़ के विकासखंड मंगरौरा स्थित ग्राम भदौना के युवा कृषक उत्कृष्ट पाण्डेय ने जैविक कृषि को अपनाकर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। उनका कृषि मॉडल आसपास के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहा है। उत्कृष्ट पाण्डेय ने लगभग एक दशक पहले अर्धसैनिक बल में राजपत्रित अधिकारी की नौकरी छोड़कर कृषि को अपना पूर्णकालिक व्यवसाय बनाने का निर्णय लिया। उन्होंने रासायनिक खेती के स्थान पर पूरी तरह जैविक कृषि को अपनाते हुए ‘ऋषि ग्राम ऑर्गेनिक्स मंडल’ की स्थापना की।वर्तमान में उत्कृष्ट पाण्डेय समन्वित कृषि प्रणाली, पौध उत्पादन, मूल्य संवर्धन और विपणन के माध्यम से प्रतिवर्ष करीब 10 से 12 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। उन्होंने अपने फार्म को एक समग्र जैविक कृषि मॉडल के रूप में विकसित किया है, जहां मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए जीवामृत, घनजीवामृत और कंपोस्ट का नियमित इस्तेमाल किया जाता है। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने के साथ उसकी गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल रही है।
फार्म पर मौसमी खाद्यान्न, दलहन, तिलहन और औषधीय फसलों का चक्रानुक्रम में उत्पादन किया जा रहा है। कृषि में विविधता के साथ दीर्घकालिक आय के लिए लगभग 2500 सफेद चंदन के पौधे भी लगाए गए हैं। किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौधे उपलब्ध कराने के उद्देश्य से फार्म परिसर में पौधशाला भी विकसित की गई है, जहां से आसपास के किसानों को प्रमाणिक पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं।औषधीय फसलों के क्षेत्र में भी उत्कृष्ट पाण्डेय ने उल्लेखनीय प्रयोग किया है। करीब दो एकड़ क्षेत्र में पीली, काली और कस्तूरी हल्दी की खेती की जा रही है। इन विशिष्ट प्रजातियों की बाजार में मांग और सामान्य हल्दी की तुलना में बेहतर मूल्य को देखते हुए किसानों को भी इनके उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। वे स्थानीय किसानों को इन प्रजातियों के शुद्ध बीज भी उपलब्ध करा रहे हैं।उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को आय बढ़ाने का प्रमुख माध्यम बनाया गया है। फार्म के उत्पादों को ‘ऋषि ग्राम’ ब्रांड के तहत बाजार में पहुंचाया जा रहा है। इनमें हल्दी पाउडर, बिलौना घी, आंवला मुरब्बा, काला नमक चावल और अरहर दाल प्रमुख हैं। इन उत्पादों की मांग स्थानीय बाजार के साथ प्रदेश और अन्य राज्यों में भी बनी हुई है।उत्कृष्ट पाण्डेय का फार्म अब केवल कृषि उत्पादन का केंद्र नहीं रहा, बल्कि किसानों के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन का माध्यम भी बन गया है। आसपास के किसान यहां जैविक पोषण तैयार करने, पौधशाला प्रबंधन, औषधीय फसलों की खेती और प्राथमिक प्रसंस्करण की तकनीक सीखने पहुंचते हैं। अनुभवों के आदान-प्रदान से क्षेत्र के कई किसान जैविक कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित हुए हैं।प्रदेश में जैविक खेती के विस्तार के लिए नमामि गंगे योजना के अंतर्गत गंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र वाले जिलों में विशेष जैविक कृषि क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य खेतों से रासायनिक अपवाह को कम करना, कछारी भूमि की प्राकृतिक उर्वरता बनाए रखना और गंगा नदी की निर्मलता में योगदान देना है।इसके साथ ही केंद्र और प्रदेश सरकार के समन्वय से परंपरागत कृषि विकास योजना और राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के माध्यम से किसानों को क्लस्टर आधारित जैविक एवं प्राकृतिक खेती के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। वर्मीकम्पोस्ट इकाइयों और प्राकृतिक कृषि आदानों के उपयोग के लिए भी किसानों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है तथा पात्र लाभार्थियों को सहायता राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से उनके बैंक खातों में पहुंचाई जा रही है।ग्रामीण क्षेत्रों में जैविक आदानों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए बायो-इनपुट रिसोर्स केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों के माध्यम से किसानों को जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और वनस्पति आधारित कीटनाशक उचित दरों पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है। इससे किसानों को जैविक खेती के लिए आवश्यक संसाधन स्थानीय स्तर पर ही मिल सकेंगे।जैविक उत्पादों की प्रामाणिकता और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए पीजीएस-इंडिया प्रमाणन को बढ़ावा दिया जा रहा है। कृषक उत्पादक संगठनों के माध्यम से किसानों को बड़े बाजारों, खुदरा श्रृंखलाओं, प्रसंस्करण इकाइयों और सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम होने और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ी है।प्रदेश के प्रमुख नगरों में जैविक हाट और विशिष्ट बिक्री केंद्रों के माध्यम से प्रमाणित जैविक उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा दिया जा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि प्रसार तंत्र के माध्यम से किसानों को फसल चक्र, जैविक पोषण, स्थानीय जलवायु और बाजार की मांग के अनुरूप खेती के लिए तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जा रहा है।जैविक और प्राकृतिक आदानों के इस्तेमाल से खेती की लागत कम करने, मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने, जलधारण क्षमता में सुधार और उपयोगी जीवों की संख्या बढ़ाने में मदद मिल रही है। प्रतापगढ़ के उत्कृष्ट पाण्डेय जैसे प्रगतिशील किसानों के अनुभव यह दर्शाते हैं कि सरकारी योजनाओं, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और कृषि उद्यमिता का समन्वय कर खेती को युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक आय का प्रभावी माध्यम बनाया जा सकता है।

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