रामनगर भड़सरा का श्रीराम जानकी मंदिर बना संत परंपरा का गौरवशाली केंद्र

1947 से 2026 तक महान संतों की तपस्या और निस्वार्थ सेवा से जागृत है सिद्ध पीठ, वर्तमान में महंत रामदास जी संभाल रहे परंपरा

देश की उपासना समाचार पत्र 

अनुराग श्रीवास्तव सिटी क्राइम रिपोर्टर 

जौनपुर (रामनगर भड़सरा)। जनपद की पावन धरती पर स्थित ऐतिहासिक श्रीराम जानकी एवं बड़े हनुमान जी मंदिर, रामनगर भड़सरा श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र होने के साथ-साथ संत परंपरा, त्याग, तपस्या और सनातन संस्कृति की गौरवशाली विरासत को संजोए हुए है। गोमती नदी के आंचल में स्थित इस सिद्ध पीठ से संतों की साधना और सेवा की समृद्ध परंपरा जुड़ी हुई है। यही कारण है कि आज भी दूर-दराज से श्रद्धालु यहां आध्यात्मिक शांति और आशीर्वाद की कामना लेकर पहुंचते हैं।

शहंशाह तपसी बाबा ने रखी संत परंपरा की नींव

मंदिर की संत परंपरा की शुरुआत स्वतंत्रता वर्ष 1947 में साकेतवास हुए श्री श्री 1008 शहंशाह तपसी बाबा जी से मानी जाती है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बीच इस पावन स्थल को अपनी तपस्थली बनाया और अखंड धुनी प्रज्ज्वलित कर मंदिर की आध्यात्मिक परंपरा को मजबूत आधार प्रदान किया। उनके द्वारा स्थापित साधना और सेवा की परंपरा आज भी इस पीठ में निरंतर आगे बढ़ रही है।

बाबा कमल दास जी ने दिखाया ईश्वरीय चेतना का मार्ग

संत परंपरा को आगे बढ़ाने में श्री श्री 1008 बाबा कमल दास जी महाराज का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अपने दिव्य उपदेशों, सरल स्वभाव और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को भक्ति, साधना और ईश्वरीय चेतना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

बाबा बजरंगदास जी महाराज की विद्वता बनी प्रेरणा

इसके बाद श्री श्री 1008 बाबा बजरंगदास जी महाराज ने मंदिर की आध्यात्मिक परंपरा को नई ऊंचाई प्रदान की। वर्ष 2002 में साकेतवास हुए बाबा बजरंगदास जी महाराज प्रखर विद्वान संत के रूप में श्रद्धालुओं के बीच सम्मानित रहे। उन्हें वेद, पुराण, मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस जैसे धार्मिक ग्रंथों का गहन ज्ञान प्राप्त था। 108 वर्ष की दीर्घायु तक समाज कल्याण और धर्म प्रचार में समर्पित रहना उनके जीवन की प्रमुख विशेषताओं में रहा। उनकी सरलता और विद्वता आज भी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्रोत है।

बाबा मोहन दास जी ने सेवा परंपरा को रखा जीवंत

संत परंपरा की अगली कड़ी में बाबा मोहन दास जी महाराज ने मंदिर की सेवा और आध्यात्मिक परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया। उनके सेवा भाव और समर्पण से मंदिर की धार्मिक गतिविधियों की निरंतरता बनी रही।

अंजान दास जी महाराज का जीवन सेवा और त्याग को समर्पित

मंदिर की सेवा परंपरा में पुजारी अंजान दास जी महाराज का विशेष स्थान रहा। 2 सितंबर 2026 को उनके साकेतवास के बाद श्रद्धालुओं और संत समाज में शोक की लहर है। उनका जीवन धर्म, सेवा और त्याग के प्रति समर्पित रहा। मंदिर की पूजा व्यवस्था और धार्मिक गतिविधियों के संचालन में उनकी निष्ठावान सेवा को श्रद्धालु आज भी स्मरण करते हैं।

महंत रामदास जी संभाल रहे संत परंपरा की जिम्मेदारी

वर्तमान में इस पावन पीठ की जिम्मेदारी महंत श्री रामदास जी महाराज संभाल रहे हैं। धर्मपरायणता, सेवा भावना और समर्पण के साथ वे मंदिर की संत परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके साथ पुजारी श्री अर्जुन दास जी मंदिर की दैनिक पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठानों और अन्य व्यवस्थाओं का संचालन पूरी निष्ठा के साथ कर रहे हैं।

संतों की तपस्या ने बनाया आध्यात्मिक केंद्र

स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार, महान संतों की तपस्या, त्याग और निस्वार्थ सेवा ने श्रीराम जानकी एवं बड़े हनुमान जी मंदिर, रामनगर भड़सरा को जौनपुर के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में विशिष्ट पहचान दिलाई है। संतों की यह परंपरा आज भी मंदिर में श्रद्धा, सेवा और आध्यात्मिक चेतना के रूप में निरंतर जीवंत है।

संकलन कर्ता: डॉ अजय तिवारी 

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