भगवान श्रीकृष्ण की महिमा पर व्यंग्य करने का अधिकार किसी को नहीं- अंकित यादव
प्रयागराज। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री द्वारा मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में रामकथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा, बांसुरी वादन और वृंदावन को लेकर की गई टिप्पणी पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष अंकित सिंह यादव ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
अंकित सिंह यादव ने कहा कि धीरेन्द्र शास्त्री ने कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के संदर्भ में कहा कि तुम्हारे ठाकुर जी तीन जगह से टेढ़े हैं, पैर के ऊपर पैर रखकर, कमर लचकाकर और गर्दन टेढ़ी करके बांसुरी बजाते हैं, जबकि हमारे भगवान श्रीराम सीधे खड़े होते हैं, उनका नाम और धाम भी सीधा है। इतना ही नहीं, उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के बांसुरी वादन की तुलना धनुष चलाने से करते हुए बांसुरी बजाने को खेल बताया। इस प्रकार की तुलना और शब्दों के चयन पर गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण दोनों सनातन संस्कृति के आराध्य हैं। दोनों में श्रेष्ठता का मुकाबला खड़ा करना या एक की महिमा बताने के लिए दूसरे के स्वरूप पर व्यंग्य करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा कोई टेढ़ापन नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति परंपरा में प्रेम, माधुर्य, सौंदर्य और दिव्यता का अनुपम प्रतीक है। उनकी बांसुरी की धुन संपूर्ण सृष्टि को प्रेम और सद्भाव का संदेश देती है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक मंचों से समाज को जोड़ने, प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया जाना चाहिए, न कि ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हों।

