जरूरी है धर्म और सत्य की पहचान खण्ड-1

जरूरी है धर्म
और सत्य की पहचान
खण्ड-1
हमारे जीवन की सार्थकता में धर्म और सत्य की पहचान है ।
कहते है कि ज्ञान में अहंकार उसी प्रकार मिश्रित होता है जिस प्रकार दूध में पानी, वास्तविक ज्ञानी हंस के समान होता है, जो ज्ञान तो प्राप्त करता है किन्तु उसके साथ मिश्रित अहंकार त्याग देता है । हमारे द्वारा ज्ञान प्राप्त करने से जीवन का पथ सही से आलोकित बनता है। वह ज्ञान का सूरज हर कदम पर साथ चलता है पर अहंकार का राहू जब डस लेता है तो सूरज को भी भरी दुपहरी मे भी सबकुछ धुंधला लगता है। अतः अहंकार रहित ज्ञान ही आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग है जिस पर चलता हुआ व्यक्ति ईश्वर साक्षात्कार के लक्ष्य तक पहुँचता है। वह संकल्प मन पर नियंत्रण का सुखद अहसास है , संकल्प जीवन की सार्थकता का एक अटूट विश्वास है । हमारे मन की स्थिरता संकल्प से बढ़ती है । हमारे जीवन के पल – पल को परिमार्जित करने वाला एक संकल्प विन्यास है। हमको महाभारत के एक विशेष पात्र कर्ण का जीवन एक विशेष उद्बोधन देता है । उसे माता कुंती ने लोकलाज के भय से त्याग दिया। वह उन्हें गुरु द्रोणाचार्य ने भी धनुर्विद्या देने से इन्कार कर दिया लेकिन कर्ण ने इन सब विपरीत व्यवहार के बावजूद स्वयं को अपने दृढ़ निश्चय व पुरुषार्थ से धनुर्विद्या के ज्ञान से निपुण कर लिया।वह उनकी शायद यह भूल रही कि उन्होंने गलत व्यक्तियों के प्रति अपनी निष्ठा रखी। वह उन्होंने सही से परिस्थितियों की सही-गलत की पहचान करने में भूल की और वास्तविकता की अनदेखी करी । उनके जीवन से हमको सबक यह है कि सार्थक जीवन में धर्म और सत्य की पहचान जरूरी है । हम देख सकते है कि किनारे पर खङे झूमते दरख्तों मे दरिया की महत्ता तब नजर आती हैं जब खलिहानों में झूमती डालियों के संग नन्ही सी चिङिया चहचहाती है । वह किसी के जीवन की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितने दिलों मे विश्वास और प्रेम की निर्मल ज्योत जला पाती है। कहते है कि अपनी मूर्खता पर पछताने से अच्छा है कि सही समय पर अपनी जिज्ञासा का समाधान मिल जाए। यह देखा गया है की मूर्खता
क्रमशः आगे
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )

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