(नई दिल्ली)ई20 के बाद अब जहाजों के ईंधन पर बड़ा बदलाव, 2029 से 10प्रतिशत बायोफ्यूल अनिवार्य करने की तैयारी
नई दिल्ली ,20 अगस्त ,(आरएनएस)। देश में ई20 पेट्रोल को लेकर इंजन, माइलेज और ईंधन की गुणवत्ता पर बहस जारी है। इसी बीच सरकार ने समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले मरीन फ्यूल को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। जहाजों से होने वाले प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए समुद्री ईंधन में बायोफ्यूल की हिस्सेदारी बढ़ाने का रोडमैप तैयार किया गया है।
सरकार ने भारतीय तटीय जलक्षेत्र में कम कार्बन और रिन्यूएबल फ्यूल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक ड्राफ्ट रोडमैप जारी किया है। इसका उद्देश्य इंडियन कोस्टल ट्रेड में चलने वाले जहाजों को धीरे-धीरे क्लीनर फ्यूल की ओर ले जाना और समुद्री परिवहन से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है।
डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ मरीन एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से जारी दस्तावेज के मुताबिक, बायोफ्यूल और उसके ब्लेंड का इस्तेमाल समुद्री परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने का अपेक्षाकृत आसान और किफायती तरीका हो सकता है। खास बात यह है कि ड्रॉप-इन बायोफ्यूल के इस्तेमाल के लिए मौजूदा जहाजों के फ्यूल सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ सकती।
प्रस्ताव के तहत समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले मरीन फ्यूल में मात्रा के हिसाब से कम से कम 10प्रतिशत बायोफ्यूल शामिल करने की दिशा में कदम उठाया गया है। सस्टेनेबल बायोफ्यूल ऐसा ईंधन होगा, जो तय मानकों वाले फीडस्टॉक से प्रमाणित प्रक्रिया के जरिए तैयार किया गया हो और जिसके स्रोत, ट्रेसिबिलिटी तथा पूरे लाइफ साइकिल में होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का रिकॉर्ड उपलब्ध हो।
इस अवधि में जहाज मालिकों, ऑपरेटरों और चार्टरर्स को बायोफ्यूल ब्लेंड की खरीद, उसकी कम्पैटिबिलिटी और स्टेबिलिटी की जांच, फ्यूल स्टोरेज और मैनेजमेंट, क्रू की ट्रेनिंग तथा फ्यूल की खपत और मशीनरी के प्रदर्शन की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं तैयार करनी होंगी।
1 जनवरी 2029 से इसके दायरे में आने वाले इंडियन कोस्टल ट्रेड के हर जहाज के प्रोपल्शन और ऑक्जिलरी मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले मरीन फ्यूल में मात्रा के हिसाब से कम से कम 10प्रतिशत बायोफ्यूल होना जरूरी होगा।
यह प्रस्ताव मरीन गैस ऑयल , वेरी लो सल्फर फ्यूल ऑयल और फ्यूल ऑयल जैसे पारंपरिक मरीन फ्यूल का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर लागू होगा। इसमें प्रोपल्शन और सहायक मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले संबंधित रेजिडुअल मरीन फ्यूल ग्रेड भी शामिल हैं।
नए प्रस्ताव का असर सिर्फ जहाज मालिकों तक सीमित नहीं रहेगा। इसके दायरे में शिप मैनेजर, ऑपरेटर, चार्टरर, मास्टर, बंकर सप्लायर, फ्यूल प्रोड्यूसर और ब्लेंडर समेत समुद्री ईंधन की खरीद, ब्लेंडिंग, सप्लाई, बंकरिंग और इस्तेमाल से जुड़े अन्य पक्ष भी आएंगे।
ष्ठत्ररू्र के मुताबिक, यह पहल नेशनल मैरीटाइम डीकार्बोनाइजेशन पॉलिसी फ्रेमवर्क , नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स 2018 और भारत के पर्यावरणीय लक्ष्यों के अनुरूप है। चरणबद्ध तरीके से लागू होने वाला यह प्रस्ताव समुद्री क्षेत्र में बायोफ्यूल का इस्तेमाल बढ़ाने और पारंपरिक फ्यूल पर निर्भरता कम करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है।

