यूनिवर्सिटी तक क्यों नहीं पहुंच पाती हैं गांव की लड़कियां?

यूनिवर्सिटी तक क्यों नहीं पहुंच पाती हैं गांव की लड़कियां?

धनवती

लूणकरणसर, राजस्थान

 

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में बदली है, लेकिन यह बदलाव अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंचा है जहां हर किशोरी के लिए 12वीं के बाद की पढ़ाई स्वाभाविक रूप से उसका अगला कदम बन सके। सरकार की विभिन्न योजनाओं के कारण प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं तक पहुंचती लड़कियों की संख्या बढ़ी ज़रूर है, लेकिन 12वीं के बाद तस्वीर उत्साहजनक नहीं लगती है।

 

इसके कई कारण भी हैं. कॉलेज और यूनिवर्सिटियां गांव से दूर होती हैं, आने-जाने का खर्च बढ़ता है, परिवार को लड़की की सुरक्षा की चिंता रहती है, घर के काम और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उसके हिस्से आती है और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में यह सवाल भी उठता है कि पढ़ाई के बाद नौकरी की क्या गारंटी है? यही वह मोड़ है जहां उच्च शिक्षा तक पहुंचने वाली एक लड़की के सामने सबसे बड़ी दीवार दिखाई देती है।

 

यदि परिवार की आय सीमित है तो एक बेटे की कॉलेज फीस और बेटी के आने-जाने के खर्च को समान नजर से देखना व्यवहार में नहीं होता है। इसके साथ घरेलू काम का असमान बंटवारा जुड़ जाता है। खेत का काम हो, पशुओं की देखभाल हो, घर संभालना हो या छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी, इन कामों का बड़ा हिस्सा अक्सर किशोरियों और युवतियों के हिस्से आता है। जिससे उनके लिए पढ़ाई के लिए समय और अवसर दोनों कम होते जाते हैं।

 

इसीलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि कितनी लड़कियां स्कूल में दाखिला ले रही हैं, क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की लड़की की चुनौती अलग है। दूरदराज के गांव की लड़की की चुनौती अलग है। अनुसूचित जाति या जनजाति परिवार से आने वाली किशोरी के सामने सामाजिक और आर्थिक बाधाएं एक साथ हो सकती हैं। किसी परिवार में पहली पीढ़ी की लड़की कॉलेज जाने वाली हो तो उसे पाठ्यक्रम, आवेदन, प्रवेश परीक्षा, छात्रवृत्ति और रोजगार की जानकारी देने वाला कोई घर में नहीं मिलता है। कम पढ़े-लिखे माता-पिता अपनी बेटी को रोकना चाहते हों, ऐसा जरूरी नहीं है. कई बार वे खुद यह नहीं जानते कि उसे आगे बढ़ाने का रास्ता क्या है?

 

हालांकि राजस्थान सरकार ने किशोरियों की शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए कई योजनाएं संचालित की हैं। गार्गी पुरस्कार और बालिका प्रोत्साहन जैसी व्यवस्थाएं अच्छी शैक्षणिक उपलब्धि हासिल करने वाली छात्राओं को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। कालीबाई भील मेधावी छात्रा स्कूटी योजना के माध्यम से पात्र छात्राओं को उच्च शिक्षा तक पहुंच आसान बनाने का प्रयास किया जाता है। देवनारायण छात्रा स्कूटी एवं प्रोत्साहन योजना भी उच्च शिक्षा के लिए छात्राओं को प्रोत्साहित करने का एक माध्यम है।

 

इन प्रयासों का असर उच्च शिक्षा के नामांकन में भी दिखाई देता है। राजस्थान के उच्च शिक्षा विभाग की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के कॉलेजों में 7.25 लाख से अधिक लड़कियां नामांकित थीं, जबकि लड़कों की संख्या करीब 5.86 लाख थी। 2023-24 में लड़कियों की संख्या 7.22 लाख और लड़कों की 6.03 लाख थी। यानी उच्च शिक्षा के दरवाजे पर भी लड़कियों की मौजूदगी मजबूत हुई है। यह बदलाव उत्साहजनक है, लेकिन इसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉलेज में नामांकन होना यह साबित नहीं करता कि हर ग्रामीण किशोरी के लिए उच्च शिक्षा वास्तव में सुलभ हो गई है।

 

ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों के लिए मास्टर डिग्री तक पहुंचने के रास्ते में पारिवारिक सोच भी एक बड़ी बाधा है. 12वीं के बाद लड़की की उच्च शिक्षा को केवल तब महत्व मिलता है जब उससे सीधे नौकरी की संभावना दिखाई देती है. ग्रामीण किशोरी को अक्सर यह साबित करना पड़ता है कि उसकी पढ़ाई किस काम आएगी? जबकि लड़के की पढ़ाई को भविष्य में निवेश मान लिया जाता है। यह अंतर केवल आर्थिक नहीं, सोच और अवसरों के वितरण से भी जुड़ा है।

 

सबसे जरूरी बदलाव यह भी होना चाहिए कि किशोरी को केवल लाभार्थी न समझा जाए। उसे अपने भविष्य की योजना बनाने वाली व्यक्ति माना जाए। उसे यह तय करने का अवसर मिले कि वह शिक्षक बनना चाहती है, नर्स, वकील, वैज्ञानिक, उद्यमी, कलाकार या किसी अन्य क्षेत्र में जाना चाहती है। कॉलेजों को भी गांव की छात्राओं तक पहुंचने के लिए केवल दाखिले के मौसम में नहीं, बल्कि 11वीं और 12वीं कक्षा से ही अपने पाठ्यक्रम और करियर विकल्पों की जानकारी पहुंचानी चाहिए। उच्च शिक्षा को गांव से बाहर की अज्ञात दुनिया बनाने के बजाय उसे किशोरी की वर्तमान दुनिया से जोड़ना होगा।

 

राजस्थान ने लड़कियों की स्कूली शिक्षा में लंबा रास्ता तय किया है। आंकड़े बताते हैं कि 15-16 वर्ष की लड़कियों के स्कूल से बाहर होने का अनुपात पिछले वर्षों में काफी घटा है, और उच्च शिक्षा में भी लड़कियों की संख्या अब लड़कों से अधिक है। लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है। शिक्षा की सफलता तब मानी जाएगी जब गांव की वह किशोरी, जिसने सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों तथा घर से लेकर बाहर तक के तानों के बावजूद 12वीं पास की है, उसका अगला कदम केवल इसलिए न रुक जाए कि कॉलेज या यूनिवर्सिटी दूर है, फीस महंगी है, बस उपलब्ध नहीं है, घर का काम उसका इंतजार कर रहा है या परिवार को उसके भविष्य का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा। यदि स्कूल तक पहुंच बनाने में हमने वर्षों की मेहनत लगाई है, तो 12वीं के बाद एक लड़की को केवल ऐसे सवालों के बीच अकेला छोड़ देना कैसा विकास है?

(यह ले

खिका की निजी राय है)

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