(वि०) पुस्तक विमोचन, पुस्तक चर्चा, सम्मान समारोह व काव्य-धारा
अपूर्वा का 31वाँ वार्षिक कार्यक्रम श्रीमती आशिमा सिंह की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। मुख्य अतिथि पद्मश्री विद्या विन्दु सिंह एवं विशिष्ट समागत के रूप में प्रो० रवि भट्ट, सुरभि सिंह (कत्थक गुरु), राहुल गुप्ता, आतिफ़ हनीफ़, प्रशान्त कुमार व विभूति मिश्र, हरीश कपूर की मौजूदगी में अमृता प्रीतम व इमरोज़ की प्रेम-गाथा “रांझां मेरा” का विमोचन हुआ।
पुस्तक चर्चा में पायल सोनी, डा० सुधा मिश्र, डॉ श्वेता श्रीवास्तव, आतिफ़ हनीफ़ ने इमरोज़ के अनूठे प्रेम को उजागर करने के लिए लेखक संजय मल्होत्रा ‘हमनवा’ को इस कृति के लिए बधाई दी।
पद्मश्री विद्या विन्दु सिंह ने संजय मल्होत्रा ‘हमनवा’ को इस अमर प्रेम को पुस्तक का रूप देने के लिए साधुवाद दिया। आशिमा सिंह ने इमरोज़ के व्यक्तित्व और सच्चे प्रेम को लोगों के बीच लाने के लिए बधाई दी। हिन्दी की पहली पुस्तक के रूप में पाठकों तक पहुँचेगी और लेखक इसके आगे भी अनूठे लोगों, विषयों पर लिखेंगे।
अपूर्वा का शिखर सम्मान श्री० आशीष सिंह को उनकी बेलाग समीक्षाओं व यात्री-सेवा हेतु दिया गया। नारी शक्ति सम्मान ‘उम्मीद’ संस्था व आराधना सिकरवार को दिया गया। इस वर्ष से शुरू हुए अपूर्वा इमरोज़ सम्मान युवा शायर कुमार विकास व डा० ममता परिहार (गीतकार) को दिए गये।
कार्यक्रम का संचालन संजय शुक्ला ‘रहबर’ ने किया! ज्योत्स्ना वर्मा ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया।
मजाज़, इमरोज़ को समर्पित काव्य संध्या
कदम-कदम पर मिलते हैं बस यहाँ गिराने वाले ही-
जो गिरतों का बने सहारा ऐसा कोई नहीं मिलता”
इन पंक्तियों से संचालन कर रहे संजय मल्होत्रा ‘हमनवा’ ने युवा गीतकार डा० ममता परिहार को बुलाया। उन्होंने कहा “कैसे कहूँ कि अब दुनिया में जीने की वजह तुम हो, तुम ही काया, तुम ही छाया, मैं तेरी सब परछाई”।
इलाहाबाद के युवा शायर कुमार विकास ने “एक मिसरे पे तंज़ मत करिए, पूरी दुनिया बहर से खारिज है।” सुनाकर समाँ बाँध दिया।
वन्दना विशेष ने “पर्वत के सीने पर राह बना दें जो कुछ प्रेमी ही दशरथ मांझी होते हैं।”
गीतकार यश अवस्थी का “तुम मिले तो इस हृदय की आग पानी हो गई” सुनाकर तालियाँ बटोरीं।
राकेश जोशी की लखनऊ पर लिखी कविता “अदब का शहर है ये सुकुने शाम का” पढ़ी सुनाई-
वरिष्ठ शायर संजय शुक्ला ‘रहबर’ ने “कलेजा चाहिए सच्चाई जानने के लिए, यकीं न हो तो ये अखबार देख लेना” से वाह-वाही पाई।
मुईन अलवी “खैराबादी” की ग़ज़ल ” खामुशी को तोड़कर इज़हार करके आ गया, एक तमाशा बर सरे बाज़ार करके आ गया” पढ़कर अपनी शायरी का लोहा मनवाया।
कानपुर से पधारी डा० माहे तिलत ने “अब कोई मसला नहीं” पढ़कर दाद हासिल की।
इसमें उस्ताद शायर राम प्रकाश ‘बेखुद’, अलका आस्थाना , प्रीति सिंह ‘प्रज्ञा’, संदीप अनुरागी व रश्मि शरद व विश्वास ‘लखनवी’ की धूम देर तक चले कार्यक्रम में मची।
संजय मल्होत्रा “हमनवा”
सचिव
9305405604

