(कुशीनगर) जुर्माना बढ़ता गया, ठेकेदार बचता गया? बुद्धा पार्क में करोड़ों के खेल पर उठे सवाल

(कुशीनगर) जुर्माना बढ़ता गया, ठेकेदार बचता गया? बुद्धा पार्क में करोड़ों के खेल पर उठे सवाल
—-बुद्धा पार्क: ठेकेदार की मनमानी या सिस्टम की मेहरबानी?30 लाख पार जुर्माना फिर भी वसूली नहीं।
कुशीनगर, 02 सितम्बर (आरएनएस)। जिला मुख्यालय रवीन्द्र नगर धूस स्थित जिलाधिकारी कार्यालय के ठीक सामने निर्मित बुद्धा पार्क में सरकारी धन खर्च होता रहा, निर्माण की समयसीमा गुजरती रही, ठेकेदार की लापरवाही सरकारी रिपोर्ट में दर्ज होती रही और जुर्माने की रकम बढ़ती रही लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। करीब 25 लाख से शुरू हुई पेनाल्टी अब तीस लाख रुपये के पार पहुंच चुकी है, बावजूद इसके ठेकेदार ने जुर्माने की राशि जमा नहीं की है। पार्क अब भी अधूरा है और उद्यान विभाग को हैंडओवर तक नहीं किया गया। दूसरी ओर परियोजना में पहले से उठ रहे भ्रष्टाचार और धन के बंदरबांट के सवाल अब इस बात से और गहरे हो गए हैं कि सरकारी रिकॉर्ड में खामियां दर्ज होने के बावजूद जिम्मेदार तंत्र आखिर किस वजह से मौन है। क्या बुद्धा पार्क में सिर्फ निर्माण अधूरा है, या फिर जवाब देही भी जानबूझकर अधूरी छोड़ी जा रही है?।
  परियोजना से जुड़े सरकारी दस्तावेजों के अनुसार निर्माण कार्य 15 सितंबर 2025 तक पूरा होकर उद्यान विभाग को हस्तांतरित हो जाना चाहिए था। लेकिन निर्धारित समयसीमा बीतने के महीनों बाद भी परियोजना पूरी नहीं हो सकी। आईजीआरएस शिकायत की जांच के दौरान जिला उद्यान अधिकारी और प्रांतीय खंड कसया के अवर अभियंता के संयुक्त हस्ताक्षर से प्रस्तुत आख्या में भी परियोजना की समयसीमा और देरी का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार एमओयू की शर्तों के तहत कार्यदायी संस्था पर 24.98 लाख रुपये की पेनाल्टी बन चुकी थी। यानी विभागीय रिकॉर्ड में ठेकेदार की देरी और उस पर लगने वाले आर्थिक दंड की स्थिति स्पष्ट है।
इसके बाद भी पेनाल्टी की वसूली नहीं हुई। निर्माण में देरी का सिलसिला आगे भी जारी रहा और पेनाल्टी की रकम बढ़ती चली गई। अब यह राशि तीस लाख रुपये से अधिक हो चुकी है। इसके बावजूद ठेकेदार द्वारा जुर्माने की रकम जमा नहीं की गई है।
जानकारों का कहना है कि जब किसी ठेकेदार की लापरवाही के कारण सरकारी परियोजना समय पर पूरी नहीं होती और अनुबंध की शर्तों के तहत आर्थिक दंड निर्धारित होता है तो उसकी वसूली की प्रक्रिया भी शुरू होनी चाहिए। लेकिन लार्ड बुद्धा पार्क में स्थिति इसके उलट दिखाई दे रही है। बताया जाता है कि पहले करीब 25 लाख रुपये की पेनाल्टी बनी। इसके बाद भी काम में देरी जारी रही। देरी बढ़ी तो जुर्माना भी बढ़ता गया। लेकिन न ठेकेदार से पुरानी पेनाल्टी वसूल की गई और न बढ़ती रकम को लेकर कोई प्रभावी कार्रवाई सामने आई। सवाल यह है कि क्या सरकारी पेनाल्टी सिर्फ कागजों में दर्ज करने के लिए है? यदि नहीं, तो फिर तीस लाख रुपये से अधिक की राशि अब तक सरकारी खाते में क्यों नहीं पहुंची?ठेकेदार काम में रुचि नहीं ले रहा था। सरकारी पत्र में यह स्वीकार करना मामले को और गंभीर बनाता है यूपीआरएनएसएस के अधिशासी अभियंता का वह पत्र, जिसमें ठेकेदार के कार्य में रुचि नहीं लेने और बार-बार निर्देश देने के बावजूद काम की गति बेहद धीमी रहने की बात स्वीकार की गई।इसके बावजूद परियोजना समय पर पूरी नहीं हुई और कार्रवाई का असर धरातल पर दिखाई नहीं दिया, जो अपने आप मे सवाल है
इनसेट– जांच अधिकारी पहुंचे तो न डीपीआर मिली, न जिम्मेदार इंजीनियर:- बुद्धा पार्क प्रकरण में आईजीआरएस जांच के दौरान सामने आया घटना क्रम भी कई सवाल खड़े करता है। जिला उद्यान अधिकारी की जांच आख्या के अनुसार निरीक्षण के समय मौके पर आवश्यक अभिलेख उपलब्ध नहीं थे। निर्माण कार्य से जुड़े जिम्मेदार इंजीनियर भी मौके पर मौजूद नहीं मिले।फोन पर संपर्क करने पर पहले बाद में आने की बात कही गई। फिर दूसरी तारीख बताई गई और उसके बाद एक और तारीख। यानी जांच अधिकारी को ‘तारीख पर तारीख’ मिलती रही, लेकिन आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सके।आखिरकार जांच अधिकारी को बिना डीपीआर के ही निर्माण स्थल का निरीक्षण करना पड़ा और उपलब्ध वास्तविक स्थिति के आधार पर अपनी आख्या पोर्टल पर अपलोड करनी पड़ी।अब सवाल यह है कि जांच के दौरान डीपीआर उपलब्ध कराने में इतनी परेशानी क्यों आई?।
इनसेट– डीपीआर नहीं मिली तो उठे तकनीकी सवाल:- जानकारो के मुताबिक किसी भी सरकारी निर्माण परियोजना के लिए डीपीआर महज एक कागज नहीं होती। यही वह दस्तावेज होता है जिसमें परियोजना की लागत,डिजाइन, निर्माण की प्रकृति, सामग्री, तकनीकी मानक और निर्धारित कार्य का विवरण दर्ज रहता है। ऐसे में यदि जांच अधिकारी को मौके पर डीपीआर उपलब्ध नहीं कराई गई तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या डीपीआर में दर्ज कार्य और मौके पर हुए निर्माण में कोई अंतर था?क्या निर्माण की गुणवत्ता और मात्रा का मिलान कराने में कोई परेशानी थी?क्या परियोजना पर खर्च धनराशि और धरातल पर हुए कार्य का वास्तविक मूल्यांकन में आंतर था?इन सवालों का जवाब निष्पक्ष तकनीकी जांच से ही सामने आ सकता है।
इनसेट– अवर अभियंता की निगरानी भी सवालों के घेरे में:- निर्माण कार्य की निगरानी करने वाले अवर अभियंता की भूमिका भी इस पूरे प्रकरण में महत्वपूर्ण हो जाती है।जब ठेकेदार लंबे समय तक काम में रुचि नहीं ले रहा था, निर्माण की गति धीमी थी और समय सीमा लगातार आगे निकल रही थी, तब साइट की निगरानी करने वाले अधिकारी ने क्या कदम उठाए?क्या उच्चाधिकारियों को लगातार रिपोर्ट भेजी गई?
क्या ठेकेदार को नोटिस जारी किए गए?क्या अनुबंध की शर्तों के तहत कार्रवाई की संस्तुति की गई?क्या मौके पर हुए निर्माण की गुणवत्ता और मात्रा का नियमित सत्यापन किया गया?और यदि यह सब हुआ तो फिर परियोजना आज भी अधूरी क्यों है?यदि कार्रवाई नहीं हुई तो निगरानी तंत्र की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इनसेट– अधूरा पार्क, बढ़ती पेनाल्टी और सरकारी धन पर सवाल:- बुद्धा पार्क का मामला अब तीन बड़े सवालों के बीच खड़ा है अधूरा निर्माण, बढ़ती पेनाल्टी और कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप।एक तरफ पार्क निर्धारित समयसीमा में पूरा नहीं हुआ। दूसरी तरफ ठेकेदार पर लगने वाली पेनाल्टी बढ़ती चली गई। तीसरी तरफ निर्माण कार्य में कथित धन के बंदरबांट और अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल बने हुए हैं।सबसे अहम बात यह है कि करोड़ों रुपये की परियोजना का पूरा लाभ जनता को अभी तक नहीं मिल सका है।पार्क का निर्माण पूरा नहीं हुआ। उद्यान विभाग को विधिवत हैंडओवर नहीं हुआ। ठेकेदार पर लगा जुर्माना जमा नहीं हुआ। और देरी जारी रहने के कारण पेनाल्टी की रकम लगातार बढ़ती जा रही है।
इनसेट– जिम्मेदारों की चुप्पी से बढ़ रहा संदेह:- बुद्धा पार्क कोई सामान्य निजी निर्माण नहीं है। यह सरकारी धन से तैयार होने वाली सार्वजनिक परियोजना है। इसलिए इसमें खर्च होने वाली प्रत्येक राशि और होने वाले प्रत्येक निर्माण कार्य की जवाबदेही तय होना जरूरी है। ऐसे में जब सरकारी दस्तावेज ठेकेदार की लापरवाही की पुष्टि करते हों, लाखों रुपये की पेनाल्टी निर्धारित हो चुकी हो, जांच के दौरान डीपीआर उपलब्ध न कराई गई हो, जिम्मेदार इंजीनियर मौके पर मौजूद न मिले हों और इसके बावजूद न तो पेनाल्टी की वसूली हो और न परियोजना समय पर पूरी हो, तो सवालों का उठना लाजिमी है।क्या यह सिर्फ विभागीय लापरवाही है या इसके पीछे किसी को फायदा पहुंचाने का खेल भी है?क्या मौके पर हुए काम का मूल्यांकन डीपीआर के मुताबिक कराया गया है?और सबसे बड़ा सवाल तीस लाख रुपये से अधिक की पेनाल्टी आखिर कब वसूली जाएगी?।

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