ब्यूरो चीफ आर एल पाण्डेय
लखनऊ। उत्तर प्रदेश दिवस के उपलक्ष्य में क्षेत्रीय पर्यटन कार्यालय पर्यटन निर्देशालय, उ०प्र० संगीत नाटक अकादमी , नव अंशिका फाउंडेशन & थिएटर एंड फिल्म वेलफेयर एसोसिएशन के तत्वावधान मे लखनऊ नाट्य समारोह के अंतर्गत दसवे दिवस समापन के अवसर पर नाट्य प्रस्तुति “कहानी एक कोठे की” का मंचन वाल्मीकि रंगशाला, संगीत नाटक अकादमी परिसर गोमती नगर,लखनऊ में चन्द्रभाष सिंह के लेखन एवं निर्देशन मे किया गया।
नाटक “कहानी एक कोठे की”
समाज के उस तबके की एक रचनात्मक कहानी है जिसे हम कभी अच्छी दृष्टि से नहीं देखते। कोठे पर काम करने वाली लड़कियां पुरूषों के भोग की वस्तु तो है पर सम्मान की हकदार नहीं। नाटक एक ऐसे कोठे की कहानी कहता है जहाँ जिस्मफरोशी का धंधा होता है।क्या वेश्यावृत्ति से धन कमाना आसान है, एक कोठे को संचालित करने में कितनी तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, आखिर ऐसी क्या वजह है जो उन्हें ऐसा घिनौना काम करने पर मजबूर करती है। कोठे पर काम करने वाली हर लड़की की अपनी अलग-अलग कहानी है जो किसी को भी द्रवित कर सकती है। यहां पर आने वाली हर एक लड़की ना जाने किन-किन मजबूरियों से लड़कर अपनी भावनाओं अपने दर्द को दबाकर काम करती है। यह जानते हुए भी कि ये दुनिया बाहरी दुनिया से बहुत अलग है, एक बार यहां आने के बाद सब खत्म। समाज में वेश्यावृत्ति को पैसा कमाने का सबसे आसान और गंदा जरिया माना जाता है, परंतु किसी को यह नहीं पता कि जितना आसान दिखता है उतना होता नहीं है ।यहां पर काम करने वाली लड़कियों को क्या क्या झेलना पड़ता है, कितने दर्द सहने पड़ते हैं । अपना ज़मीर मारकर क्या कुछ नहीं सुनना पड़ता । नाटक में दिखाया गया है कि कोठे की मालकिन कितनी मुश्किलों में कोठे को संचालित करती है। कोठे में काम करने वाली चन्दा जिसका 13 साल की उम्र में बलात्कार उन लोगो ने ही किया जिनको वो भईया बोलती थी, पुलिस ने भी उन्हें ही दबाया , समाज ने भी ताने उसके आई- बाबा को ही दिए और अंत में वो हारकर काम के लिए शहर आई पर यहां भी उसे कोई काम नहीं मिला और अंत में वह भटकते-भटकते कोठे पहुंच गई।वहीं एक नौजवान कोठे पर इसलिए जाता है कि उसकी बहन जो कि 2 साल पहले गायब हो गयी है जिसका कुछ भी पता नहीं चल पाया, हो सकता है उसे किसी ने कोठे पर बेच दिया हो वो मिल जाय।
कोठे में लोकल विधायक का बेटा राजेश बाघमारे कोठे की लड़कियों के साथ जबरदस्ती करता है, उसका जब मन होता है चला आता है मना करने पर कोठे पर रेड डलवाता है, रेड डालने वाले सबकी बेज्जती करके चले जाते है। कोठे में तावड़े जो कि एक पुलिसकर्मी है आता जाता रहता है जिसे कोठे की मालकिन कोठे की सुरक्षा के लिए रुपये भी देती है पर वो इस बार कुछ नहीं कर पाता। बाघमारे और कोठे की एक लड़की शीला से एक बेटी भी है जो कि अभी सिर्फ 9 साल की है। बाघमारे उस लड़की के साथ सोना चाहता है, तावड़े ये बर्दाश्त नहीं कर पाता और दोनों में हाथापाई शुरू हो जाती है इसी बीच शीला वाघमारे को गोली मार देती है, सब डर जाते हैं क्योंकि राजेश बाघ मारे विधायक का बेटा होता है अंत में कोठे की मालकिन अपने आपको कत्ल के जुर्म में गिरफ्तार करवाने और सभी लड़कियों को कोठे से बाहर जाने के लिए कहती है। नाटक वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के हर दर्द को दिखाने का प्रयास करता है।
कलाकार मंच पर
चन्दा- जूही कुमारी
शीला- निहारिका कश्यप
पिंकी- श्री ऐश जयसवाल
नज़मा- श्रुति पांडेय
मुन्नी- साक्षी अवस्थी
तावड़े- विशाल वर्मा
राजेश बाघमारे- कारन दीक्षित
भाऊ- अग्नि सिंह
पुलिस- अंशुल पाल, राम चरन, वरुण सिंह
अन्य-आशीष सिंह, कोमल प्रजापति, विशाल वर्मा, अंजलि सिंह
कोठे की मालकिन(बा) -चन्द्रभाष सिंह
मंच पर
रंगदीपन- तारा उप्रेती
संगीत संचालन-सौरभ शुक्ला
मंच व्यवस्था- विशाल श्रीवास्तव, कोमल प्रजापति
रूपसज्जा – सचिन गुप्ता
वेशभूषा – सभी कलाकार
मंच प्रॉपर्टी- निहारिका कश्यप
प्रस्तुति नियंत्रक- अर्जुन सिंह
मंच संचालन – कवलजीत सिंह
सह निर्देशन- जूही कुमारी
लेखक एवं निर्देशक – चन्द्रभाष सिंह
नीशू त्यागी
अध्यक्ष
नव अंशिका फाउंडेशन
राजेश जैसवाल
संरक्षक
नव अंशिका फाउंडेशन
राहुल गुप्ता
प्रदेश अध्यक्ष
थिएटर एंड फिल्म वेलफेयर एसोसिएशन उपस्थित रहे।

