पानी के लिए भटकना भी महिलाओं का श्रम माना जाए

पानी के लिए भटकना भी महिलाओं का श्रम माना जाए

सोनिया

लूणकरणसर, राजस्थान

 

रेगिस्तान में पानी केवल प्यास बुझाने की जरूरत नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाला संसाधन है। बीकानेर जिले के लूणकरणसर ब्लॉक का खियेरा गांव इस सच्चाई को आज भी अपने रोजमर्रा के जीवन में महसूस करता है। यहां कुछ परिवार ऐसे हैं, जिनके घरों तक जल जीवन मिशन के तहत नल का कनेक्शन नहीं पहुंच पाया है। नतीजा यह है कि इन घरों की महिलाओं और किशोरियों को आज भी पानी के लिए दूसरों के घरों, दूर के जल स्रोतों और कभी-कभी महंगे टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। पानी की यह कमी केवल प्यास की समस्या नहीं है। यह उनके समय, शिक्षा, आर्थिक स्थिति और श्रम से जुड़ा सवाल भी बन जाती है।

 

जिन परिवारों के घर नल नहीं पहुंचा, उनके लिए पानी का इंतजाम घर की चारदीवारी के बाहर शुरू होता है। किसी दिन दूसरे घर से पानी मिल जाता है तो समस्या कुछ समय के लिए हल हो जाती है, लेकिन कई बार वहां से भी पानी देने से मना कर दिया जाता है। तब परिवारों को दूसरे स्रोत तलाशने पड़ते हैं। कई बार पानी की जरूरत इतनी जरूरी हो जाती है कि किशोरियों को अपनी पढ़ाई तक छोड़नी पड़ती है। धीरे-धीरे यह स्थिति उनके जीवन में एक ऐसे चक्र को जन्म देती है, जो उनके शिक्षा के अवसर, भविष्य में उनके लिए बेहतर रोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता की संभावनाओं को सीमित कर देती है।

 

पानी की तलाश में लगने वाला समय महिलाओं और किशोरियों के उस अदृश्य श्रम का हिस्सा है, जिसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं लगाया जाता। वे घर के लिए पानी लाती हैं, लेकिन इस ज़िम्मेदारी के बदले उन्हें न तो पैसे मिलते हैं और न ही उनके समय की कीमत तय होती है क्योंकि उनके इस काम को अक्सर काम नहीं माना जाता है। यही वो खामोश भेदभाव है, जो किसी कानून या नियम में लिखा हुआ नहीं होता, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देता है। ऐसी व्यवस्थाओं पर सवाल कम उठते हैं, क्योंकि इसे जिम्मेदारी नहीं बल्कि महिलाओं का स्वाभाविक काम मान लिया गया है।

 

जल जीवन मिशन का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को पर्याप्त मात्रा और निर्धारित गुणवत्ता का पानी नियमित रूप से घर में उपलब्ध कराना है। केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2025 तक राजस्थान में कुल 1.08 करोड़ दर्ज ग्रामीण परिवारों में से 24.95 लाख परिवारों को नल के कनेक्शन उपलब्ध कराए जा चुके थे। मिशन की 2025-26 की योजना में राजस्थान के लिए 32.64 लाख कनेक्शनों का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें 14.13 लाख कनेक्शन की प्रगति दर्ज हुई, यानी निर्धारित लक्ष्य का 43.3 प्रतिशत। वहीं राजस्थान के उन गांवों में, जहां पाइप से जलापूर्ति व्यवस्था मौजूद है, 1.06 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 63.74 लाख परिवारों के पास घरेलू नल कनेक्शन दर्ज हैं। यानी ऐसे गांवों में कनेक्शन कवरेज करीब 60 प्रतिशत है। ये आंकड़े बताते हैं कि योजना ने काफी दूरी तय की है, लेकिन अंतिम घर तक पहुंचने की चुनौती अभी बाकी है।

 

यही चुनौती खियेरा जैसे गांवों में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। जिन घरों तक नल नहीं पहुंचा, टैंकर एक वैकल्पिक रास्ता जरूर है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बार-बार टैंकर मंगवाने का खर्च घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ डालता है। जिस परिवार की आय पहले ही सीमित हो, उसके लिए पानी खरीदना भोजन, बच्चों की पढ़ाई या दूसरी जरूरी जरूरतों में कटौती का कारण बन सकता है। इस तरह पानी की कमी गरीब परिवारों को दोहरा नुकसान पहुंचाती है। एक तरफ उन्हें पानी जुटाने में समय और श्रम खर्च करना पड़ता है, दूसरी तरफ पानी खरीदने पर पैसा।

 

रेगिस्तानी क्षेत्र में पानी के प्राकृतिक या स्थानीय स्रोतों पर निर्भरता आसान नहीं है। गर्मी और लगातार घटते जल स्रोतों के बीच कई स्रोत सूख जाते हैं। ऐसे में पानी की तलाश और लंबी हो जाती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब घर में पानी नहीं होता, तो उसे लाने की जिम्मेदारी आखिर महिलाओं और किशोरियों के हिस्से ही क्यों आती है? पानी की कमी प्राकृतिक हो सकती है, लेकिन पानी ढोने की जिम्मेदारी का यह बंटवारा प्राकृतिक नहीं है। घर के काम, खाना बनाना, सफाई और बच्चों की देखभाल की तरह पानी लाना भी लंबे समय से महिलाओं के काम के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।

 

खियेरा गांव की समस्या किसी एक गांव की समस्या भर नहीं है। यह उस सवाल को सामने रखती है कि विकास की योजनाओं का वास्तविक लाभार्थी कौन है? अगर किसी गांव में अधिकांश घरों तक नल पहुंच जाए, लेकिन कुछ परिवारों की महिलाएं और किशोरियाँ आज भी पानी के लिए दूर-दूर भटक रही हों, तो काम पूरा मान लेना जल्दबाजी होगी। यह देखना जरूरी है कि जिन घरों को कनेक्शन मिला है, वहां पानी वास्तव में नियमित रूप से पहुंच रहा है या नहीं और जो घर छूट गए हैं, उनकी पहचान कर उन्हें कब तक जोड़ा जाएगा, क्योंकि कागज पर कनेक्शन दर्ज होना और घर में रोज पानी पहुंचना दो अलग बातें हैं। साथ ही, योजना की सफलता का पैमाना केवल यही तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि असल पैमाना यह होनी चाहिए कि इससे महिलाओं और किशोरियों के जीवन में कितना बदलाव आया है?

(यह लेखिका

की निजी राय है)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *