बीबीएयू में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और वंदे मातरम् की सांस्कृतिक पहचान पर हुई विचार गोष्ठी
लखनऊ, (आरएनएस )। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में हिंदी प्रकोष्ठ की ओर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों, स्वदेशी और स्वावलंबन तथा ‘वंदे मातरम्’ की सांस्कृतिक पहचान पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने की। कार्यक्रम में शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. राजशरण शाही, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल, स्वदेशी जागरण मंच के क्षेत्रीय संयोजक अनुपम श्रीवास्तव तथा कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मौजूद रहे।कार्यक्रम की शुरुआत बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। आयोजन समिति की ओर से मंचासीन अतिथियों को अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न भेंट कर स्वागत किया गया। कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए गोष्ठी के उद्देश्य और रूपरेखा की जानकारी दी।कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन और राष्ट्रहित में किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए उनके विचारों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देश और समाज के हित को सर्वोपरि रखते हुए अपना जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित किया तथा समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण और समावेशी विकास से जुड़े विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि यह गीत देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय चेतना की भावना का संचार करता है तथा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों में देश के प्रति समर्पण और एकजुटता की भावना मजबूत करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।प्रो. राजशरण शाही ने ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शैक्षणिक चिंतन’ विषय पर अपने विचार रखते हुए भारतीय शिक्षा और संस्कृति की मूल भावना पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में प्रेम, परस्पर सामंजस्य और जनकल्याण को विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के शैक्षणिक चिंतन के संदर्भ में शिक्षा को समाज और राष्ट्र के विकास से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के प्रभाव से भारतीय शिक्षा के स्वरूप में व्यापक बदलाव आया और इसके साथ कई चुनौतियां भी सामने आईं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भाषा के विकास और भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और विचारों को आगे बढ़ाने का आधार है। भारतीय भाषाओं के विकास से शिक्षा को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने और देश के समग्र विकास को गति देने में मदद मिल सकती है।अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने ‘वंदे मातरम् : एक सांस्कृतिक पहचान’ विषय पर भारतीय संस्कृति, स्वदेशी चेतना और राष्ट्रभाव के अंतर्संबंधों पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि स्वदेशी भावना ने भारतीय समाज में अपनी संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्र के प्रति आत्मीयता को मजबूत करने में भूमिका निभाई। उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना को मजबूत किया। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को भारतीय राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में रेखांकित किया।स्वदेशी जागरण मंच के क्षेत्रीय संयोजक अनुपम श्रीवास्तव ने ‘दीनदयाल जी की दृष्टि में स्वदेशी और स्वावलंबन’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में स्वदेशी केवल वस्तुओं के उपयोग तक सीमित नहीं था, बल्कि इसे आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता के आधार के रूप में देखा गया। उन्होंने स्थानीय स्तर पर निर्मित वस्तुओं को प्रोत्साहित करने और स्वदेशी उत्पादों के उपयोग पर जोर दिया। युवाओं का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि युवा रोजगार तलाशने के साथ रोजगार सृजन की दिशा में भी आगे बढ़ें। उन्होंने आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में युवा शक्ति की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए ‘हर घर स्वदेशी और हर युवा उद्यमी’ का लक्ष्य रखने की बात कही।गोष्ठी के दौरान उपस्थित प्रतिभागियों ने स्वदेशी भावना को अपने जीवन में अपनाने, स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की शपथ ली। कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रीति राय ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर प्रो. सनातन नायक, प्रो. बी.एन. दुबे, डॉ. प्रीति राय, डॉ. नमिता जैसल, डॉ. रमेश चंद्र नैलवाल, डॉ. संध्या दीक्षित सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।
बीबीएयू में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और वंदे मातरम् की सांस्कृतिक पहचान पर हुई विचार गोष्ठी
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