खेती की जमीन पर फसल के साथ बिजली भी पैदा करेगा उत्तर प्रदेश, 2047 तक 150 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य

खेती की जमीन पर फसल के साथ बिजली भी पैदा करेगा उत्तर प्रदेश, 2047 तक 150 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य

लखनऊ ( आरएनएस )। उत्तर प्रदेश अब खेती की जमीन का उपयोग किए बिना किसानों की आय बढ़ाने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को गति देने की दिशा में नई पहल करने जा रहा है। प्रदेश में एग्रीवोल्टाइक तकनीक को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसके तहत खेतों में ऊंचाई पर सौर पैनल लगाए जाएंगे और उनके नीचे फसलों की खेती भी की जा सकेगी। इससे एक ही जमीन से अनाज और बिजली दोनों का उत्पादन संभव होगा। प्रदेश सरकार का लक्ष्य किसानों को अन्नदाता के साथ ऊर्जादाता बनाना, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाना और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश को अग्रणी राज्य के रूप में स्थापित करना है। ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत मंत्री ए.के. शर्मा ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित सातवें एग्रीवोल्टाइक विश्व सम्मेलन-2026 के राज्य स्तरीय मंत्री सत्र में प्रदेश की नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी योजनाओं और एग्रीवोल्टाइक रणनीति को प्रस्तुत करते हुए यह बात कही। उन्होंने बताया कि प्रदेश ने वर्ष 2030 तक 32 गीगावाट और वर्ष 2047 तक 150 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है।मंत्री ए.के. शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में सौर ऊर्जा उत्पादन को जनभागीदारी से जोड़ने का काम तेजी से आगे बढ़ा है। घरों की छतों से लेकर खेतों तक सौर ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना और प्रधानमंत्री कुसुम योजना ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश भी सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने, किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और निवेश के नए अवसर विकसित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश देश का प्रमुख कृषि उत्पादक राज्य है और यहां खेती तथा ऊर्जा उत्पादन को एक-दूसरे का पूरक बनाकर विकास की नई संभावनाएं तैयार की जा सकती हैं।एग्रीवोल्टाइक तकनीक को प्रदेश की कृषि और ऊर्जा संबंधी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में लगभग तीन करोड़ किसान खेती पर निर्भर हैं। वहीं, राज्य की 80 प्रतिशत से अधिक कृषि जोत एक हेक्टेयर से छोटी हैं। ऐसे में किसानों के लिए उपलब्ध जमीन का बेहतर उपयोग करना जरूरी है। एग्रीवोल्टाइक प्रणाली के तहत खेतों में ऊंचाई पर सौर पैनल लगाए जाते हैं, जिससे उनके नीचे उपयुक्त फसलों की खेती जारी रखी जा सकती है। इससे कृषि भूमि को केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने की आवश्यकता कम होगी और किसान एक ही खेत से खाद्यान्न तथा बिजली दोनों प्राप्त कर सकेंगे। यह मॉडल खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है।मंत्री ने बताया कि उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जिसे एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं के लिए एशियाई विकास बैंक से तकनीकी सहायता प्राप्त हुई है। इस दिशा में वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान में 100 किलोवाट क्षमता का पायलट एग्रीवोल्टाइक संयंत्र स्थापित किया जा रहा है। परियोजना की व्यवहार्यता संबंधी अध्ययन पूरा हो चुका है और अब यह क्रियान्वयन के चरण में है। इस परियोजना के माध्यम से कृषि और सौर ऊर्जा के संयुक्त उपयोग की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा। इसके परिणाम भविष्य में प्रदेश के अन्य कृषि क्षेत्रों में इस तकनीक के विस्तार के लिए उपयोगी आधार तैयार कर सकते हैं।प्रदेश में घरेलू सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। मंत्री के अनुसार, प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है। प्रदेश में लगभग नौ लाख घरों पर 3,018 मेगावाट क्षमता के रूफटॉप सोलर संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं और राज्य को आवंटित लक्ष्य का लगभग 80 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। इस योजना के माध्यम से घरों में सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ बिजली पर होने वाले खर्च को कम करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार का उद्देश्य अधिक से अधिक परिवारों को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ना और ऊर्जा उत्पादन में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाना है।कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत भी काम किया जा रहा है। इसके घटक सी-1 में उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है। इस श्रेणी के अंतर्गत 8,896 कृषि पंपों को 76.2 मेगावाट क्षमता के साथ सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है। वहीं, घटक सी-2 के अंतर्गत 581 उपकेंद्रों के लिए 1,708 मेगावाट क्षमता की बिजली खरीद संबंधी समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इन पहलों से कृषि क्षेत्र में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने और किसानों को सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्थाओं से जोड़ने में मदद मिलने की उम्मीद है।उपयोगिता स्तर की सौर ऊर्जा परियोजनाओं के क्षेत्र में भी प्रदेश की क्षमता का विस्तार हो रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 3,098 मेगावाट क्षमता की सौर परियोजनाएं चालू हैं, जबकि 6,295 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं क्रियान्वयन के अधीन हैं। इनमें 3,310 मेगावाट क्षमता के सौर पार्क भी शामिल हैं। सरकार का प्रयास है कि सौर ऊर्जा उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के साथ विद्युत आपूर्ति व्यवस्था को अधिक स्वच्छ और टिकाऊ बनाया जाए। बड़े सौर पार्कों और अन्य परियोजनाओं के विकास से निवेश, निर्माण गतिविधियों और संबंधित क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।बायो-ऊर्जा के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। मंत्री ने बताया कि प्रदेश में 353 टन प्रतिदिन की कुल क्षमता वाले 42 संपीड़ित बायोगैस संयंत्र हैं और इस क्षेत्र में राज्य देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। कृषि अवशेषों तथा अन्य जैविक संसाधनों के उपयोग से ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में यह क्षेत्र महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त अवसर मिलने और जैविक संसाधनों के बेहतर उपयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी प्रदेश में नई तकनीकों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। गोरखपुर और रामपुर में स्थापित पायलट संयंत्रों से प्रति घंटे 31.5 किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन हो रहा है। इसके अलावा आईआईटी कानपुर, आईआईटी बीएचयू और मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के साथ दो उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन पहलों का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के विकास, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना है, ताकि भविष्य में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का व्यापक उपयोग किया जा सके।नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार अपनी नीतियों के माध्यम से निजी कंपनियों और परियोजना विकासकर्ताओं को प्रोत्साहन दे रही है। सौर ऊर्जा नीति-2022, जैव ऊर्जा नीति-2022 और हरित हाइड्रोजन नीति-2024 के तहत विभिन्न प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इनमें निजी परियोजना विकासकर्ताओं को 15,000 रुपये प्रति एकड़ प्रतिवर्ष की दर से भूमि उपलब्ध कराने, शत-प्रतिशत स्टांप शुल्क छूट और सौर परियोजनाओं के लिए 10 वर्ष तक विद्युत शुल्क में छूट जैसे प्रोत्साहन शामिल हैं। हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं के लिए सामान्य श्रेणी में 10 से 30 प्रतिशत तक और सुपर मेगा परियोजनाओं के लिए 35 से 40 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी का प्रावधान बताया गया है। वहीं, संपीड़ित बायोगैस संयंत्रों के लिए प्रति टन प्रतिदिन क्षमता पर 75 लाख रुपये की सब्सिडी का प्रावधान है। इन प्रोत्साहनों के जरिए प्रदेश में निवेश आकर्षित करने और स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार को गति देने का प्रयास किया जा रहा है।मंत्री ए.के. शर्मा ने कहा कि विकसित उत्तर प्रदेश-2047 के लक्ष्य को हासिल करने में नवीकरणीय ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राज्य ने वर्ष 2030 तक 32 गीगावाट और वर्ष 2047 तक 150 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है। उन्होंने केंद्र सरकार की घोषित प्रधानमंत्री कुसुम-2.0 योजना के तहत 10 गीगावाट क्षमता वाले एग्रीवोल्टाइक घटक में उत्तर प्रदेश की अग्रणी भूमिका निभाने की तैयारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने वैश्विक निवेशकों, परियोजना विकासकर्ताओं और विशेषज्ञों से प्रदेश के स्वच्छ ऊर्जा अभियान में भागीदार बनने का आह्वान किया।मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश का उद्देश्य केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि इसके लाभ किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंचाना भी है। एग्रीवोल्टाइक जैसी तकनीकों के माध्यम से कृषि भूमि का बेहतर उपयोग, किसानों की आय के नए स्रोत और स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार एक साथ संभव हो सकता है। सरकार को उम्मीद है कि नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देकर प्रदेश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगा तथा विकसित भारत के संकल्प में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

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