चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
लखनऊ (आरएनएस )। कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभय दुबे ने शुक्रवार को संयुक्त प्रेस वार्ता कर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया, आयोग के भीतर कथित असहमति और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सवाल उठाए। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि मतदाता सूची लोकतंत्र और नागरिक के मताधिकार का मूल आधार है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार के बदलाव की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और वैधानिक होनी चाहिए।कांग्रेस नेताओं ने कहा कि 2 मार्च 2023 को अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर व्यवस्था निर्धारित की थी। उनके अनुसार अदालत ने कहा था कि जब तक संसद इस संबंध में कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। इसके बाद दिसंबर 2023 में संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और पदावधि से संबंधित कानून बनाया, जिसमें चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य को शामिल किया गया।कांग्रेस नेताओं ने फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार की मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्ति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 17 फरवरी को चयन समिति की बैठक हुई और उसी रात नियुक्ति की अधिसूचना जारी हुई। ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी को पदभार संभाला। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस प्रक्रिया पर असहमति नोट दर्ज किया था। कांग्रेस के अनुसार राहुल गांधी की आपत्तियों में मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से हटाए जाने का मुद्दा भी शामिल था।प्रेस वार्ता में कांग्रेस नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18(2) का हवाला देते हुए कहा कि आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना है और मतभेद की स्थिति में बहुमत की राय मान्य होती है। उनके अनुसार तीन सदस्यीय आयोग में दो-एक का बहुमत निर्णय के लिए पर्याप्त है तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल अपने पद के आधार पर अलग निर्णायक मत का अधिकार नहीं दिया गया है।कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विभिन्न मामलों को लेकर कम से कम 14 लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, मतदाता आंकड़ों और सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था के केंद्रीकरण सहित कई विषय शामिल बताए गए। उन्होंने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने निर्णयों की जानकारी उन्हें नहीं दिए जाने को लेकर भी शिकायत की थी। कांग्रेस नेताओं के अनुसार मई से अगस्त 2026 के बीच आयोग की पूर्ण बैठक नहीं हुई और 9 सितंबर को चार महीने बाद पूर्ण बैठक हुई।प्रेस वार्ता में 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की ओर से दर्ज की गई असहमति का भी उल्लेख किया गया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुछ भाषणों से जुड़े आदर्श आचार संहिता के मामलों में आयोग द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के दौरान लवासा ने असहमति दर्ज की थी। उन्होंने अपनी अल्पमत राय को रिकॉर्ड में शामिल किए जाने की मांग को लेकर तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र भी लिखे थे।कांग्रेस नेताओं ने एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि एसआईआर का पहला चरण जून से सितंबर 2025 के बीच बिहार में हुआ, जबकि दूसरे चरण की शुरुआत 4 नवंबर 2025 से हुई। तीसरे चरण को 30 मई 2026 से जारी बताया गया। कांग्रेस नेताओं के अनुसार तीनों चरणों में 26 राज्य और छह केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं तथा इस दौरान बड़ी संख्या में मतदाता नाम हटाए जाने और मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाने का दावा किया गया।फॉर्म छह में किए गए बदलाव को लेकर कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह नए मतदाता के पंजीकरण का वैधानिक प्रपत्र है और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित है। उनके अनुसार इसमें आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर सूची में होने से संबंधित नया सवाल जोड़ा गया। कांग्रेस ने दावा किया कि मई 2026 में विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी और सुखबीर सिंह संधू ने भी इसका समर्थन किया। कांग्रेस नेताओं के अनुसार संधू ने 13 अगस्त को इसे ‘अनधिकृत और अवैध’ बताते हुए हटाने की मांग की थी।कांग्रेस ने एसआईआर के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाते हुए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) का उल्लेख किया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि इस प्रावधान के तहत निर्वाचन आयोग किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से की मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे सकता है, लेकिन इस अधिकार के प्रयोग के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और नई अनिवार्य शर्तों का वैधानिक आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 324 और 327 के बीच संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुच्छेद 327 संसद को चुनाव और मतदाता सूचियों से संबंधित कानून बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की संवैधानिक जिम्मेदारी देता है। कांग्रेस नेताओं ने मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा ए.सी. जोस बनाम सिवन पिल्लै मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां कानून मौन हो, वहां आयोग अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग कर सकता है, लेकिन संसद द्वारा बनाए गए कानून और उसके अनुरूप बनाए गए नियमों के विपरीत आदेश जारी करने की सीमा पर संवैधानिक प्रश्न उठते हैं।कांग्रेस नेताओं ने कहा कि उनका मुख्य सवाल केवल यह नहीं है कि निर्वाचन आयोग के पास एसआईआर कराने की शक्ति है या नहीं, बल्कि यह है कि मतदाता सूची जैसे लोकतंत्र के मूल आधार से जुड़े निर्णय कितनी पारदर्शिता, वैधानिक प्रक्रिया और संस्थागत सहमति के साथ लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि आयोग के भीतर किसी प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां दर्ज हुई हैं तो उन आपत्तियों के निस्तारण की प्रक्रिया और उसके आधार को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। प्रेस वार्ता में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के चेयरमैन कुंवर सिंह निषाद और मीडिया समन्वयक पूर्वी क्षेत्र पुनीत पाठक भी मौजूद रहे।
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