भारतीय पुनर्जागरण एवं पुनरुत्थान में ब्राह्मणों की भूमिका
लेखक:(प्रोफे० जी० सी० पाण्डेय-अवकाश प्राप्त) सरस्वती सम्मान प्राप्त पर्यावरण विद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश
भारत का स्वाधीनता आन्दोलन वास्तव में आज से 400 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुआ। मुगल साम्राज्य के अन्तिम दिनों में जब औरंगजेब का अत्याचार पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। महाराष्ट्र की तपःपूत पुण्य धरा पर एक साधारण ब्राह्मण परिवार में एक बालक पैदा हुआ। जिसे नारायण नाम से जाना गया। कालान्तर में विवाह मण्डप में बैठा नारायण पुरोहितों द्वारा अन्तःपट के समय-सावधान? नारायण सावधान? सुनते ही विवाह मण्डप से कूद कर भाग निकला और आठ कोस तक रुका ही नहीं। उसके बाद नारायण देश देशान्तर में भ्रमण करता रहा। अपनी किशोरावस्था में स्वभाव से चपल, निरंकुश नारायण पता नहीं कैसे वेद-वेदागों का महापंडित ही नहीं राष्ट्र संत के रुप में राष्ट्र के उद्धार के लिए राष्ट्रीय क्षितिज पर उदित हो गया। महाराष्ट्र के तत्कालीन सन्तों में एक सन्त तुकाराम से जब हिन्दू पदपातशाही के स्वप्नद्रष्टा युग पुरुष छत्रपति शिवाजी महाराज दीक्षा लेने गए तो सन्त तुकाराम ने परामर्श दिया कि शिवा, तुम समर्थ रामदास से दीक्षा ग्रहण करो। इस समय उनकी कोटि का कोई राष्ट्रसन्त नहीं हैं। नारायण अब समर्थ रामदास के रुप में एक महान राष्ट्रसन्त के रुप में विख्यात हो गये थे। उनका एक ही महामंत्र और उद्घोष था- श्री राम जय राम जय जय राम जय जय श्री रघुबीर समर्थ। इस त्रयोदशाक्षर मंत्र का तेरह करोड़ जाप किया था। तदोपरान्त मंत्र को समर्थ ने राष्ट्रीय पुनरुत्थान, राष्ट्रीय पुनर्जागरण, के लिए मृतसंजीवनी महाविद्या के महामंत्र के रुप में प्रचारित किया। केवल कौपीन लपेट कर खड़ाऊ पहन कर एक दण्ड धारण कर समर्थ ने हिमालय की उपत्यका से लेकर गंगा-यमुना सतलज रावी के पवित्र तटों से लेकर क्षिप्रा, नर्मदा, बेतवा, गोदावरी आदि पुण्यनीरा नदियों के तट पर ग्यारह सौ मंन्दिरों तथा विशाल अखाड़ों की स्थापना की।
समर्थ रामदास केवल महाराष्ट्र के ही नहीं समग्र राष्ट्र के एक युगान्तरकारी महापुरुष थे। अपनी कालजयी कृति दासबोध में तत्कालीन भारत का नग्न चित्रण उन्होंने जिस जीवन्त रुप में किया है। उतना स्पष्ट निर्भीक सजीव चित्रण कोई इतिहासकार या उनका समकालीन महापुरुष नहीं कर सका है। समथांचेसामर्थ नामक ग्रन्थ में इस युगप्रवर्तक महापुरुष के कृतित्व का प्रमाणिक वर्णन है। समर्थ गुरु रामदास ने आज से 400 शताब्दी पूर्व जिस स्वाधिनता यज्ञ का प्रज्वलित किया वह निरन्तर धधकता रहा। समय-समय पर विभिन्न अध्वर्यु, ऋत्विक, होता,उद्गाता, आचार्य, पुरोधा यजमानो ने उस यज्ञ को प्रज्ज्वलित किया। इस स्वाधीनता यज्ञ के महान् यजमान छत्रपति शिवाजी महाराज थे। इसके महापुरोधाओं में दादा कोण्डदेव, बाजीराव पेशाव, बालाजी विश्वनाथ, ताना जी मालसरे नाजाजी पेशवा उल्लेखनीय हैं।
कालान्तर में इस स्वाधीनता यज्ञ को बाजीराव पेशवा के उत्तराधिकार नानाजी पेशवा ने असंख्य राष्ट्र भक्तों के प्राणों की आहूति देकर जागृत ज्वलन्त रखा। इस यज्ञ में प्रमुख पुरोधा के रुप में नाना साहब के एक छोटे से कर्मचारी से स्वतंत्रता संग्राम के महायोद्धा बने तात्या टोपे ने जागृत किया। कट्टर वैष्णव ब्राह्मण कुल का युवक अपने इन क्रान्तिकारी सुधारों, विचारों के कारण उस युग के पाखण्डी पुरोदितों ब्राह्मणों की कटु आलोचना का प्रमुख केन्द्र बन गया। उस क्रान्तिकारी युवक के महान् मिशन को तत्कालीन गर्वनर महान् सुधारवादी विलियम बेन्टिकन का समग्र समर्थन तथा सहयोग मिला।
नाना साहब की मुँहबोली प्राणप्यारी बहन छबीली (मनु) ने जागृत किया। यही मनु झांसी की महारानी लक्ष्मीनाई के रुप में विश्वविख्यात हुई। जिसने अपने प्राणों की आहूति देकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। लक्ष्मीबाई पेशवा के कुल पुरोहित पन्त परिवार की कन्या थी। कालान्तर में इस महायज्ञ को न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे ने जागृत किया। इस यज्ञ के महाअध्दुर्य लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक बने। श्री तिलक महाराष्ट्र के विश्वविख्याद प्रखर राष्ट्रभक्त तथा महामेधावी चितपावन ब्राह्मणों की कुल परम्परा में थे। चितपावन ब्राझाण वंश में महात्मा गोखले, आचार्य बिनोवा भावे, बाबा राघव दास (उत्तर प्रदेश के गॉधी) तथा इस महायज्ञ में तिल-तिल आहूति देने वालों में प्रखर राष्ट्रभक्त सावकर बन्धुओं एवं चापेकर बन्धुओं, वासुदेव बलवन्त फड़के एवं महान योद्धा पिंगले का तेजस्वी इतिहास विश्वविदित है।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद हवन का ईंधन एवं हवि की मात्रा कम हो गयी पिंगले ने अपने प्राणों की आहूति दी। श्री तिलक के समाचार पत्र मराठा तथा केसरी में प्रकाशित अग्र लेखों ने वेद की ऋचाओं तथा मंत्रों का काम किया। तिलक के साथ-साथ उनके समर्पित सहयोगियों ने इस राष्ट्रीय महायज्ञ को प्रचण्ड रूप से प्रज्ज्वलित कर दिया। श्री तिलक ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के लिए सिंहनॉद किया, “स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, और हम उसे लेकर ही रहेंगे।” श्री तिलक के प्रमुख सहयोगियों में विपिनचन्द पाल, लाला लाजपत राय, श्री अरविन्द विशेष उल्लेखनीय हैं। श्री अरविन्द को तिलक अपना आदर्श मानते थे। इस महायज्ञ में जीवन की आहूति देने वालों में प्रखर राष्ट्रभक्त ब्राह्मणों में सावकर बन्धुओं की भूमिका विश्वविख्यात है। विनायक दामोदर सावकर को भारत ने स्वातंत्र वीर की उपाधि दी। अण्डमान की काल कोठरी में उस काल पुरूष ने भारत प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 का प्रमाणिक इतिहास लिख दिया। इसे राष्ट्र नायकों ने राष्ट्र भक्तों की गीता कहाँ है। विनायक दामोदर सावरकर के साथ ही उनके सहोदर बन्धु नारायण दामोदर सावरकर, गणेश दामोदर सावरकर तथा आंशुतोष लडिड़ी तथा भाई परमानन्द सहित अनेक राष्ट्र भक्त कालापानी की सजा काट रहे थे। महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों की प्रखर परम्परा में पंण्डित गोपाल कृष्ण गोखले अग्रणी थे। इनके प्रमुख शिष्यों में महात्मा गांधी का इतिहास विश्वविख्यात है। पत्रकारिता जगत के महापुरोधा सी०वाई० चिन्तामणि (यज्ञेश्वर चिन्तामणि) दक्षिण कर्नाटक के निवासी थे। उनकी शिक्षा उच्चकोटि की नहीं थी, किन्तु स्वाध्याय की दृष्टि से वे प्रखर प्रतिभा के पुंज थे। वाणी के वरद पुत्र तथा प्रथम कोटि के पत्रकार एवं संपादक थे। लीडर के संपादक के रूप में उनकी ख्याति देश के बाहर भी थी। ब्रिटिश साम्राज्य उनसे भयभीत था। देश के शीर्षस्थ राष्ट्र नायक गोपाल कृष्ण गोखले, महामना मालवीय, सरतेजबहादुर सप्रू, पंण्डित मोतीलाल नेहरू, पंण्डित अयोध्यानाथ लीडर के निदेशक मण्डल में थे तथा चिन्तामणि का सम्मान करते थे। चिन्तामणि लीडर के प्रधान सम्पादक थे। भारत के तत्कालीन वायसराय सुबह उठते ही सर्व प्रथम लीडर का संपादकीय पढ़ते थे। श्री चिन्तामणि की प्रतिस्पर्धा तत्कालीन पत्र पायनियर के प्रतिनिधि विन्सस्टर्न चर्चिल से थी जो बाद में ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने। दूसरे गोलमेज कान्फ्रेंस में सर्वाधिक भूमिका श्री चिन्तामणि की ही थी। महामना मालवीय जी के निर्देश पर गोलमेज सम्मेलन की समग्र भूमिका महात्मा गाँधी के परामर्श से सी०वाई० चिन्तामणि ने तैयार की थी। श्री चिन्तामणि की अद्भुत वक्तृत्व कला एवं प्रखर प्रतिभा से “सम्राट जार्ज पंचम एवं ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडानाल्ड” भी प्रभावित हुए। उनके कलम का जादू सिर चढ़ कर बोलता था। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल की कैबिनेट के सदस्य के रूप में उनकी भूमिका स्वर्णाक्षरों में अंकित करने योग्य है। कभी-कभी उनकी लेखनी महान् राष्ट्र नायकों को भी अपनी निष्पक्ष, निष्छल आलोचना का विषय बनाकर हतप्रभ और स्तब्ध कर देती थी। एक बार तो उन्होंने अपने महान
गुरू गोपाल कृष्ण गोखले की भी मर्यादित आलोचना कर उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया। पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री चिन्तामणि पत्रकारिता के भीष्म पितामह ‘हिन्दु’ के संस्थापक सम्पादक जी०एस०सुब्रमणियम् के बाद राष्ट्र की महान विभूती डा०सच्चिदानन्द सिन्हा के शिष्य थे। श्री चिन्तामणि कभी-कभी उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की स्वस्थ आलोचना से नहीं चूकते थे। एक बार तो श्री चिन्तामणि ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महान् न्यायमूर्ति सर शाह सुलेमान सेठ को भी अपनी कलम से विचलित कर दिया था। श्री चिन्तामणि के प्रशंसकों में राष्ट्र के महान न्यायमूर्ति शायर अकबर इलाहाबादी भी थे।
राष्ट्र भक्त ब्राह्मण विभूतियों में महाराष्ट्र के बाद बंग भूमि का उल्लेख आवश्यक है। आज से लगभग तीन सदियों पूर्व बंग भूमि में एक परम वैष्णव उच्चकुलीन ब्राह्मण कुल में एक तेजस्वी बालक अवतरित हुआ। बालक का नाम राममोहन था। उस समय बंग भूमि में अन्ध विश्वासों का अन्धड़ चल रहा था। पोप पाखण्ड का साम्राज्य था। कुरीतियों, कुठांओं, कदाचार का कुहासा छाया हुआ था। विसंगतियों, विपदाओं, विषमताओं, विरोध भासो का वात्याचक्र चल रहा था। राममोहन राय केक्ल 23 वर्ष की अल्प आयु में ही बंगला, अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, जर्मन, अरबी, फारसी, संस्कृत आदि प्रमुख भाषाओं में निपुण हो गये थे। उन्होंने वेद, उपनिषदों का भी अध्ययन किया। कुरीतियों, कुप्रथओं, अन्धविश्वासों के विरूद्ध बगावत का झण्डा बुलन्द करने वाले वे आधुनिक युग के प्रथम महापुरूष थे। परवती समाज सुधारकों ने उनका ही अनुगमन किया। बाल विवाह, बेमेल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा तथा विभिन्न पोप पाखण्डों के वे प्रबल विरोधी थे।
राजा राम मोहन राय ने इस अमिट राष्ट्रीय कलंक को सदा के लिए धो दिया। राजा राम मोहन राय निराकार ईश्वर के उपासक थे। उनके विरूद्ध पाखण्डी पण्डा पुरोहित ने एक षड्यंत्र पूर्वक जेहाद छेड़ दिया था। उन्हें जाति बहिष्कृत तक का कठोर दण्ड दिया गया। कालान्तर में उनके कट्टर वैष्णव माता-पिता बन्धु-बान्धवों ने भी उनका परित्याग कर दिया। यहाँ तक की उनकी जीवन संगिनी धर्म परायणा पतिव्रता पत्नी ने भी उनका साथ छोड़ दिया। किन्तु महामानव अपने लक्ष्य पथ पर अडिग अविचल रहा। न्यायज्ञात पथः प्रविचलन्ति पंद न धीराः,, की उक्ति के अनुसार हिमगिरि की भांति अडिग रहा। उनके प्रमुख सयोगियों में द्वारिकानाथ ठाकुर थे। राजा राम मोहन राय तथा द्वारिकानाथ ठाकुर आदि ब्रह्म समाज केसंस्थापक थे। राममोहन राय को तत्कालीन मुगल दरबार द्वारा राजपुरी उपाधि प्रदान की गयी थी। ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत वे उच्चपदस्थ राजस्व अधिकारी थे। 18 वीं सदी में महान क्रान्तिकारी, समाज सुधारक, महान शिक्षाविद्, मनीषी के रूप में वे विश्वविख्यात हुये। 19वीं सदी में तो शताधिक महापुरूषों ने विभिन्न क्षेत्रों में विचार क्रान्ति द्वारा विविध क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। किन्तु 18 वीं सदी का उन्होंने समग्र क्रान्ति की दृष्टि से अकेले प्रतिनिधित्व किया। वे विश्वस्तर के अद्वितीय क्रान्तदर्शी महामानव थे। राजा राममोहन राय के बाद 19 वीं सदी में बंग भूमि पर धर्म, अध्यात्म, भक्ति, योग, दर्शन के क्षेत्र में समग्र क्रान्ति करने वाले एक अद्भुत महापुरूष का अवतरण हुआ। उनके विषय में भारत के चिन्तकों, मनीषियों के अतिरिक्त विश्वविख्यात इतिहासकारों तत्व चितंकों ने जो कहा है उसका सांकेतिक सन्दर्भ आवयश्क है। उस विलक्षण महापुरूष रामकृष्ण परमहंस के संबंध में उस युग के सार्वभौम महामानव योगिराज श्री अरविन्द ने कहा ‘इस युग की सबसे बडी चमत्कारी पूर्ण घटना यह है कि दक्षिणेश्वर के एक निरक्षर सन्त ने मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया। तत्कालीन फ्रेंच इतिहासकार नोबल पुरस्कार विजेता रोमॉरोला ने उनकी प्रामाणिक जीवनी लिखकर उनके प्रति श्रद्धा प्रकट की। उनके महान गुरू योगिराज तोतापुरी ने कहा मैंने चार दशकों तक कठोर साधना कर जिस निविकल्प समाधि की सिद्धि प्राप्त की उसे यह अपढ़ पगला सहज भाव से केवल चार दिनों में प्राप्त कर लिया’ इतना कह कर महायोगी तोतापुरी भावमग्न हो नाचने लगे। राम कृष्ण के प्रशंसकों में तत्कालीन विश्व के सर्वश्रेष्ठ महापंण्डित एवं आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फ्रेडरिक, मैक्समुलर भी थे। मैक्स मुलर को स्वामी विवेकानन्द गुरू तुल्य मानते थे एवं श्रद्धा से मोक्ष मुलर कहते थे। रामकृष्ण परमहंस देव ने अपने महान शिष्य नरेन्द्र दत्त (स्वामी विवेकानन्द) के माध्यम से समग्र विश्व में उदात्त मानवीय संस्कृत का सन्देश दिया। एतत देश प्रसूतस्य सकसशादग्रजन्मनः स्वं० स्वं चरित्र शिक्षिरन पृथिव्याम सर्व मानवाः के अनुसार इस विलक्षण अपढ ब्राम्हण ने अपने उत्तराधिकारी शिष्य के माध्यम से समग्र भूमण्डल पर चरित्र की शिक्षा का प्रकाश फैला दिया। रामकृष्ण परमहंस देव की धर्म भार्या माँ शारदा मणि का वात्सल्य, स्नेह, ममता की संजीवनी विधा के बल पर विवेकानन्द की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने इस मृत प्राय राष्ट्र में प्राण फूंक दिये। बंग भूमि में सहस्त्रों युवकों तथा बंग कन्याओं को दीक्षा देकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। सिस्टर निवेदिता को मोशारदा मणि का वरदहस्त और अमोध आशिर्वाद प्राप्त था। विश्व कवि रविन्द्रनाथ ठाकुर, श्री अरविन्द, लोक मान्य तिलक, महामना मालवीय, देश बन्धु चितरंजन दास, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, जगदीश चन्द्र बसु आदि सिस्टर निवेदिता के प्रति श्रद्धावान थे। इसके मूल में मो शारदा का आशीर्वाद था। रामकृष्ण परमहंस देव के बाद बंग भूमि की ब्राह्मण विभूतियों में महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर, सत्येन्द्र नाथ ठाकुर (श्री प्रथम भारतीय आई०सी०एस०), अवनीन्द्र नाथ ठाकुर (महान चित्रकार नन्दलाल बसु के गुरू), रथीन्द्र नाथ ठाकुर (श्री रवीन्द्रनाथ के पुत्र) विशेष उल्लेखनीय हैं। जोड़ा सांकू निवासी ठाकुर परिवार की ख्याति समग्र विश्व में है। शान्ति निकेतन के संस्थापक एवं गीतांजलि काव्य पर नोबल पुस्कार विजेता गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर मांधीजी के सांस्कृतिक गुरू थे। बंग भूमि के ही सर सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ब्राह्मण कुल की महान विभुति थे। जिन्होंने 1885 मैं राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पूर्व ही समग्र भारत में तूफानी दौरा करके राष्ट्रीय पुनर्जागरण एवं पुरूत्थान की मशाल जलाया। सर सुरेन्द्र नाथ (आई०सी०एस०) अद्वितीय वक्ता एवं प्रशासक थे। उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। वे कांग्रेस के संस्थापकों में से थे। बंग भूमि में ही ब्राह्मण कुल गौरव मुखोपाध्याव परिवार था। इस परिवार के मुखिया थे। सर आशुतोष मुखर्जी महान शिक्षा विद, न्यायविद, विधिवेत्ता, समाज सेवी, कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति तथा उच्च न्यायहय के न्यायमूर्ति। इनके महान पुत्रों में डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष संसाद केन्द्रीय मंत्री तथा भारतीय जनसंख्य के संस्थापक थे। भारत के प्रधानमंत्री रहे श्री अटल मिहारी वाजपेयी इनके सचिव थे। डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी काश्मीर के अमर हुतात्मर हुआ के रूप में भी विख्यात थे। इनके अनुज रामाप्रसाद गुखर्जी कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति थे। डा० मुखर्जी सर आशुतोष मुखर्जी तथा देवी योगमाया के महान पुत्र थे। बंग भूमि में ही शिक्षा के क्षेत्र में विशेषकर कन्याओं की शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्ति का सूत्रपात करने वालों में अग्रिम पंक्ति में महान शिक्षाविद् श्री ईश्वर चन्द्र विधासागर पुरे राष्ट्र के लिए प्रकाश स्तम्भ के रूप में विश्वविदित हैं। वे जिला विद्यालय निरीक्षक भी थे तथा ब्राह्मण कुल के गौरव ये। बंग भूमि के एक महान सपूत बंकिम चन्द्र चटूटोपाध्याय ब्राम्हण कुल की महान विभूति के साथ-साथ राष्ट्र की महान विभूति थे। सांस्कृतिक, साहित्यिक, राजनैतिक क्रान्ति यज्ञ के वे महान अध्वर्य थे। उनका आनन्द मठ उपान्यास विश्वविदित है। उस उपान्यास का एक गीत”वन्दें मातरम’ राष्ट्रगीत के रूप में राष्ट्रमक्तों का अमोध मंत्र बन गया था। लाखों हुतात्माओं ने वन्दे मातरम महामंत्र का उद्घोष करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी। बंकिम बाबू के बाद महान उपान्यासकार, कहानीकार, वाणी के वरद पुत्र शरद चन्द्र चटूटोपाध्याय का उल्लेख आवश्यक है। उनकी कालजयी कृतियों न केवल बंगला साहित्य अपितु विश्व वागमय की अमूल्य धरोहर है। प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू एवं पं० अटल बिहारी वाजपेयी का योगदान देश के लिए एक स्वर्णिम युग कहा जाएगा।
पर्यावरण बचाइये : 147-आ०वि० कालोनी, अंगूरीबाग, अयोध्या। मानवता बचाइये

