भारत सरकार के लिए नया कर्ज लेना अधिक महंगा हो गया है। केंद्र को अपने बजट का एक चौथाई हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज पर खर्च करना पड़ता है। इसीलिए अब स्थिति अधिक विकट हो गई है।

विश्व-व्यापी रूप

भारत सरकार के लिए नया कर्ज लेना अधिक महंगा हो गया है। केंद्र को अपने बजट का एक चौथाई हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज पर खर्च करना पड़ता है। इसीलिए अब स्थिति अधिक विकट हो गई है।

बॉन्ड यील्ड (बॉन्ड्स पर ब्याज दर बढ़ने) के संकट ने इस हफ्ते विश्व-व्यापी रूप ले लिया है। सिर्फ चीन इससे बचा हुआ है, जहां असल में बॉन्ड्स पर ब्याज दरें गिरी हैं। वरना, अमेरिका में 30 वर्ष के बॉन्ड पर ब्याज दर पांच प्रतिशत से ऊपर उस सीमा पर है, जहां 2007-08 की मंदी के बाद वह कभी नहीं पहुंची। मंगलवार को यह दर ब्रिटेन में 1998 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। जर्मनी, फ्रांस, जापान- लगभग हर विकसित बाजार में एक जैसी हालत है। वैश्विक वित्तीय बाजारों में मचे इस उथल-पुथल का भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा है। जब कभी अमेरिका जैसे बाजारों में सरकारी बॉन्ड पर अधिक ब्याज मिलने लगती है, विदेशी संस्थागत निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालने लगते हैं। इससे बॉन्ड बिकवाली की होड़ लग जाती है।

बॉन्डधारक बिकवाली में शामिल ना हों, इसके लिए उन्हें अधिक ब्याज दर का लालच देना पड़ता है। ताजा वैश्विक रुझान का ही असर है कि भारत सरकार के 10-वर्षीय बेंचमार्क बॉन्ड पर ब्याज दर बढ़ कर 7.09 फीसदी के आसपास पहुंच गई है। स्पष्टत: भारत सरकार और भारतीय कंपनियों के लिए नया कर्ज लेना अधिक महंगा हो गया है। जिस समय भारत सरकार को अपने बजट का एक चौथाई हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज पर खर्च करना पड़ रहा हो, नई स्थिति कितनी बड़ी चुनौती है, उसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस बीच अनुमान है कि विदेशी निवेशकों को आकर्षित किए रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ाएगा। लेकिन उससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन महंगे होंगे, जिनका बोझ भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। विकसित देशों में बॉन्ड संकट का कारण राजकोषीय सेहत को लेकर वहां उपजा संदेह है। बढ़ते गए कर्ज का बोझ और तेल-गैस महंगा होना इस संदेह की प्रमुख वजहें हैं। इन कारणों का दबाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी है। इसी कारण विदेशी निवेशकों में डॉलर बाहर ले जाने की होड़ लगी। उसका परिणाम रुपये की कीमत गिरने के रूप में सामने आया। अब ये सारी परिस्थितियां अधिक गंभीर रूप में फिर सामने आ खड़ी हुई हैं।

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