सुलतानपुर। जिले के उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन केंद्र में सरकारी कामकाज की तस्वीर सवाल खड़े करने वाली नजर आई। गुरुवार को जब मीडिया टीम जमीनी हकीकत जानने कार्यालय पहुंची तो उपायुक्त उद्योग नेहा सिंह कार्यालय में मौजूद नहीं मिलीं। कुर्सी खाली थी और फरियादी अपने काम के लिए अधिकारी का इंतजार करते नजर आए।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। उपायुक्त की मौजूदगी के बारे में जब कार्यालय में मौजूद कर्मचारियों से जानकारी मांगी गई तो जवाब एक नहीं, कई मिले। कोई उन्हें दौरे पर बताए जाने लगा तो कोई उनकी गैरमौजूदगी की वजह से ही अनजान नजर आया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकारी कार्यालय में अधिकारी की मौजूदगी का हिसाब भी क्या गोलमोल जवाबों के भरोसे चलेगा। दूर-दराज से आने वाले छोटे उद्यमियों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के लिए अधिकारी का कार्यालय में न मिलना महज असुविधा नहीं, बल्कि उनके समय और काम दोनों पर भारी पड़ सकता है। जिन योजनाओं के जरिए लोगों को स्वरोजगार और उद्योग के लिए सरकारी मदद मिलनी है, उन्हीं के दफ्तर में यदि अधिकारी से मुलाकात ही मुश्किल हो जाए तो उद्यम प्रोत्साहन की सरकारी मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।
स्थानीय लोगों और विभागीय सूत्रों का दावा है कि उपायुक्त उद्योग की कार्यालय में अनुपस्थिति को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उपायुक्त उद्योग का कार्यालय में नियमित बैठना सुनिश्चित है और यदि नहीं, तो उनके अनुपस्थित रहने का आधिकारिक कारण क्या है। शासन लगातार अधिकारियों को समय से कार्यालय पहुंचने और जनता की समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण करने के निर्देश देता है। ऐसे में सुलतानपुर के उद्योग विभाग की यह तस्वीर सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करती नजर आ रही है। अब निगाह जिला प्रशासन और विभागीय उच्चाधिकारियों पर है कि वे मामले की वास्तविकता की जांच कर यह स्पष्ट करेंगे कि उपायुक्त कार्यालय में क्यों नहीं थीं, उनकी अनुपस्थिति अधिकृत थी या नहीं और फरियादियों को अधिकारी से मिलने के लिए आखिर कितने चक्कर लगाने पड़ेंगे।
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