बुझ गया उर्दू शायरी का सबसे चमकदार सितारा
(डाक्टर अजय तिवारी जिला संवाददाता)
अयोध्या।जनवादी लेखक संघ, फैजाबाद इकाई द्वारा सम्मानित वरिष्ठ उर्दू शायर बशीर बद्र के निधन पर एक शोकसभा का आयोजन आभा होटल सभागार में किया गया।सभा में बशीर बद्र साहब की जनपक्षधर कविताओं, ग़ज़लों और एक शायर के रूप में उनकी मानवीय संवेदनाओं को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सभा की अध्यक्षता जनवादी लेखक संघ के जिलाध्यक्ष मो ज़फ़र ने की।शोकसभा के प्रारम्भ में डॉ विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि बशीर बद्र साहब ने आम आदमी को संबोधित करते हुए सादा ज़बान में बहुत गहराई से अपनी शायरी को आला मुक़ाम तक पहुँचाया। उनको इस बात के लिए भी याद किया जाएगा कि जीवन के तल्ख़ अनुभवों के बावजूद उनकी शायरी में कहीं से कड़वाहट नहीं आने पाई। मो ज़फ़र साहब ने कहा कि बशीर बद्र साहब की कविता साम्प्रदायिक सद्भाव और इंसानियत की मिसाल थी। उन्होंने कहा कि वे अवाम के शायर थे जो आसान ज़बान में वक़्त की तल्ख़ सच्चाइयों को बयान करने का हुनर रखते थे। नाज़िश फ़ातिमा ने उनके शेर ‘सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा’ के माध्यम से बशीर बद्र की शायरी में फ़लसफ़ाई गहराई को सराहा।उन्होंने उनकी कई अन्य ग़ज़लों का भी पाठ किया। सत्यभान सिंह ने बशीर बद्र को ‘आम आदमी का शायर’ बताते हुए कहा कि उनकी शायरी में दर्द के साथ उम्मीद भी थी। उन्होंने उनकी चर्चित किताबों ‘आखिरी किताब’ और ‘ख्वाब जला रहे हैं’ का जिक्र किया। युवा कवि राजीव श्रीवास्तव ने बशीर बद्र साहब की ग़ज़लों का तरन्नुम में पाठ कर उनको श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि अपनी किशोरावस्था में उर्दू शायरी की ओर झुकाव ही बशीर बद्र साहब की वजह से हुआ। वाहिद अली ने भी उनके अशआर सुनाते हुए कहा कि बशीर साहब ने उर्दू शायरी को आम बोलचाल की भाषा दी और उसे जन-जन तक पहुँचाया। अखिलेश सिंह ने कहा कि उनकी सादगी भरी शायरी, जैसे— “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए” और “यह नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो”— लोगों की जुबान पर हमेशा के लिए बस चुकी हैं | बृजेश श्रीवास्तव ने कहा कि बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वो मुश्किल अल्फाज में नहीं, सीधे दिल में उतरती थी। पूजा श्रीवास्तव ने कहा कि मोहब्बत को उन्होंने मुश्किल नहीं, आसान बताया। उनकी शायरी में दर्द था, लेकिन उम्मीद भी थी; मोहब्बत थी, लेकिन दिखावा नहीं था। रामजी तिवारी और विजय श्रीवास्तव ने भी बशीर बद्र को याद करते हुए उनके चुनिंदा अशआर सुनाए। शोकसभा में कई अन्य लेखक, कवि और संस्कृतिकर्मी भी मौजूद रहे।

