एआई के हाथों में अतीत, 80 के दशक में लौटे सियासी चेहरे
बेलबॉटम से बड़े कॉलर तक फिर लौटा पुराना दौर
सोशल मीडिया पर युवाओं का नया अवतार
यादों की दस्तक या 2027 की सियासी रणनीति
फोटो परिचय-(1) एआई से बनी दम्पती की फोटो।
फतेहपुर। दुनिया जब वर्ष 2050 की जरूरतों को ध्यान में रखकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, डिजिटल क्रांति और तकनीकी विकास की नई पटकथा लिख रही है, उसी दौर में सोशल मीडिया पर चार दशक पुराना 1980 का दशक अचानक फिर से जवान हो उठा है। बड़े कॉलर की शर्ट, बेलबॉटम पैंट, जैकेट, लंबे बाल और उस दौर का खास अंदाज अब गलियों और बाजारों में नहीं, बल्कि एआई की बनाई डिजिटल तस्वीरों में दिखाई दे रहा है। खास बात यह है कि इस रेट्रो लहर में अब आम चेहरों के साथ सियासी चेहरे भी तेजी से शामिल हो रहे हैं। रेट्रो अंदाज में तैयार की गई तस्वीरें सोशल मीडिया पर पहुंचते ही लोगों का ध्यान खींच रही हैं। किसी चेहरे को 80 के दशक के पहनावे में देखकर पुरानी पीढ़ी को अपनी यादें लौटती दिखाई देती हैं, तो नई पीढ़ी के लिए यही तस्वीरें कुछ अलग, अनोखी और साझा करने योग्य डिजिटल सामग्री बन जाती हैं। यही वह बिंदु है, जहां यह ट्रेंड सिर्फ फैशन या मनोरंजन नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक बदलाव और बदलते राजनीतिक संवाद की ओर भी इशारा करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने तस्वीरों की दुनिया में कल्पना की सीमाएं लगभग मिटा दी हैं। किसी भी चेहरे को किसी खास दशक के परिधान, हेयर स्टाइल, रंग-रूप और माहौल में ढालना अब मुश्किल नहीं। लेकिन असली सवाल तकनीक का नहीं, उसके इस्तेमाल का है। जिस एआई को दुनिया भविष्य की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और शासन की नई तस्वीर बनाने वाली तकनीक मान रही है, उसी एआई के जरिए बीते दौर की तस्वीरें दोबारा बनाई जा रही हैं। दरअसल, तकनीक भले नई हो, लेकिन इंसानी भावनाएं आज भी पुरानी यादों से जुड़ी हैं। रेट्रो तस्वीरें इसी भावनात्मक जुड़ाव को डिजिटल दुनिया में नया जीवन दे रही हैं। सियासी चेहरों का 80 के दशक के अंदाज में सोशल मीडिया पर नजर आना इस ट्रेंड को और दिलचस्प बना देता है। राजनीति में लंबे समय तक जनसंपर्क का मतलब जनसभा, पोस्टर, बैनर, अखबार और भाषण हुआ करता था। अब मोबाइल की स्क्रीन और सोशल मीडिया की टाइमलाइन भी राजनीतिक संवाद का बड़ा मैदान बन चुकी है। ऐसे में रेट्रो लुक सियासत के लिए एक ऐसा माध्यम बन सकता है, जिसमें पुरानी पीढ़ी के लिए भावनात्मक जुड़ाव और नई पीढ़ी के लिए डिजिटल आकर्षण-दोनों एक साथ मौजूद हैं।
एक तरफ 80 के दशक को देखने वाली पीढ़ी अपने पुराने दिनों की झलक तलाशती है, दूसरी तरफ जेन-जी को वही अंदाज नया और मनोरंजक लगता है। यही दोहरा आकर्षण रेट्रो कंटेंट को तेजी से लोकप्रिय बनाता है। राजनीतिक संचार में भावनाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। कभी पुराने नारों ने लोगों को जोड़ा, कभी पुरानी तस्वीरों ने भावनाएं जगाईं और अब एआई उन्हीं भावनाओं को डिजिटल रूप दे रहा है। रेट्रो तस्वीरों के जरिए किसी नेता को पुराने दौर से जोड़ना क्या उस समय की सादगी, लोकप्रिय संस्कृति और जनमानस की यादों को छूने की कोशिश है ? या फिर सोशल मीडिया पर कुछ नया और अलग दिखने की सामान्य कवायद? फिलहाल इसका कोई एक जवाब नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि राजनीति अब सिर्फ भाषणों से नहीं, दृश्य प्रस्तुति और डिजिटल कहानी कहने की कला से भी प्रभावित हो रही है। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सोशल मीडिया का महत्व लगातार बढ़ रहा है। राजनीतिक दल और नेता मतदाताओं के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचने के लिए नए डिजिटल प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में एआई से तैयार रेट्रो तस्वीरें भले अभी मनोरंजन और ट्रेंड का हिस्सा दिखाई दें, लेकिन इनके जरिए नई पीढ़ी से संवाद का रास्ता तलाशने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आखिर राजनीति में वही चेहरा ज्यादा याद रहता है, जो मतदाता के मन में अपनी जगह बना ले। अगर एक तस्वीर कुछ सेकेंड में मुस्कान, याद और चर्चा पैदा कर दे, तो डिजिटल राजनीति में उसका महत्व समझा जा सकता है। 80 का दशक भले चार दशक पीछे छूट चुका हो, लेकिन उसकी शैली, संगीत, फैशन और यादों की चमक आज भी खत्म नहीं हुई। फर्क सिर्फ इतना है कि तब पुराने अंदाज जिंदगी का हिस्सा था और आज वही अंदाज एआई की कल्पना से दोबारा गढ़ा जा रहा है। अब देखना यह है कि यह पुरानी लहर कुछ दिनों का सोशल मीडिया ट्रेंड बनकर खत्म हो जाती है या आने वाले चुनावी दौर में राजनीतिक संवाद का नया अंदाज बनती है। बड़ा सवाल यह है कि जब नजर भविष्य के मतदाता पर है, तो सियासत अतीत की तस्वीरों का सहारा क्यों ले रही है शायद जवाब यही है भविष्य जीतने की दौड़ में अतीत को भुलाया नहीं जाता, बल्कि नई पीढ़ी की भाषा में फिर से पेश किया जाता है।
——————————

