एक पैटर्न मेकर:-प्रोफेसर योगेश सिंह और दिल्ली विश्वविद्यालय की बदलती कहानी।

एक पैटर्न मेकर:-प्रोफेसर योगेश सिंह और दिल्ली विश्वविद्यालय की बदलती कहानी।

प्रोफेसर के.पी. सिंह

 

नई दिल्ली।

8 अक्टूबर 2026 का दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दिन के रूप में दर्ज होने जा रहा है। इस दिन प्रोफेसर योगेश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय कुलपति के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल का आरंभ करेंगे।लगभग एक शताब्दी पुराने इस विश्वविद्यालय के इतिहास में यह अवसर इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि दूसरे कार्यकाल के साथ प्रो.सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में ऐसा करने वाले केवल दूसरे कुलपति होंगे।उनसे पहले सर मौरिस ग्वायर ने 1938 से 1952 तक विश्वविद्यालय का नेतृत्व किया था।

इतिहास कभी-कभी स्वयं को दोहराता है, लेकिन हर बार उसका संदर्भ अलग होता है।सर मौरिस ग्वायर के समय का दिल्ली विश्वविद्यालय स्वतंत्रता-पूर्व भारत के बौद्धिक निर्माण का केंद्र था।आज का दिल्ली विश्वविद्यालय एक ऐसे भारत का प्रतिनिधित्व करता है जो ज्ञान, प्रौद्योगिकी,नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के नए युग में प्रवेश कर चुका है। इसलिए प्रो.योगेश सिंह का दूसरा कार्यकाल केवल एक प्रशासनिक निरंतरता नहीं, बल्कि एक नए संस्थागत चरण की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए।

दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना 1 मई 1922 को हुई थी।इसके आरंभिक वर्षों को डॉ.हरि सिंह गौर, डॉ.मोती सागर,डॉ.अब्दुल रहमान,डॉ.राम किशोर और सर मौरिस ग्वायर जैसे विद्वान प्रशासकों ने दिशा दी। इन लोगों ने केवल विश्वविद्यालय चलाया नहीं; उन्होंने उसके संस्थागत चरित्र की नींव रखी।

इस लेख को लिखते हुए मेरे लिए एक विशेष आत्मीयता और जिम्मेदारी दोनों हैं।वर्ष 1995 से दिल्ली विश्वविद्यालय से मेरा संबंध रहा है—पहले विद्यार्थी के रूप में,फिर शिक्षक,शिक्षक-कार्यकर्ता और अकादमिक प्रशासक के रूप में।पिछले तीन दशकों में मैंने विश्वविद्यालय को अनेक चरणों से गुजरते देखा है।मैंने इसके अकादमिक विस्तार, प्रशासनिक चुनौतियों, उपलब्धियों और परिवर्तन की प्रक्रियाओं को निकट से अनुभव किया है।प्रो.योगेश सिंह के कार्यकाल में मुझे उनके साथ विभिन्न भूमिकाओं में काम करने का अवसर मिला—निदेशक,गांधी भवन; प्रोवोस्ट,पी.जी.पुरुष छात्रावास;विभागाध्यक्ष, पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग और दिल्ली विश्वविद्यालय शताब्दी समारोह के समन्वयक के रूप में।इसलिए मेरे लिए उनका मूल्यांकन केवल बाहर से देखने वाले व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं है।मैंने निर्णय-प्रक्रियाओं को निकट से देखा है,संस्थागत चुनौतियों को अनुभव किया है और विकास की उस प्रक्रिया का हिस्सा रहा हूँ, जिसे आज हम पीछे मुड़कर उपलब्धियों के रूप में देख रहे हैं।

किसी कुलपति की सफलता का पैमाना क्या है? कुलपति की सफलता को केवल भाषणों,बैठकों या योजनाओं की संख्या से नहीं मापा जा सकता। किसी विश्वविद्यालय का वास्तविक विकास दिखाई देता है—लोगों में,पदों में, भवनों में,नए विषयों में,नए अवसरों में और अंततः विद्यार्थियों के भविष्य में।

मेरी दृष्टि में उच्च शिक्षा संस्थान के विकास के पाँच प्रमुख पैमाने हैं—People, Places, Programmes, Performance और Possibilities.।कितने लोगों को नियुक्ति मिली? कितने शिक्षकों को पदोन्नति मिली?कितने नए विभाग और केंद्र बने?कितने नए भवन खड़े हुए?कितने नए पाठ्यक्रम शुरू हुए?

अनुसंधान कितना बढ़ा? विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान कितनी मजबूत हुई और सबसे महत्वपूर्ण—क्या विद्यार्थियों के लिए भविष्य के नए द्वार खुले?इसी कसौटी पर किसी नेतृत्व का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।मैं अक्सर कहता हूँ:”लोग आपकी प्रक्रिया को हमेशा याद नहीं रखते;वे आपके परिणाम को याद रखते हैं। और उत्कृष्ट परिणाम ही ऐसे मील के पत्थर बनाते हैं जो इतिहास रचते हैं।” प्रो. योगेश सिंह का पहला कार्यकाल इसी दृष्टि से उल्लेखनीय रहा है।

पहले कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों में विश्वविद्यालय में शिक्षण एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर नियुक्तियाँ और पदोन्नतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।इन प्रयासों से विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक तंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान मिला है।इस अवधि में लगभग 5,581 शिक्षण एवं गैर-शिक्षण पदों पर नियुक्तियाँ की गईं।इनमें विभिन्न महाविद्यालयों में 4,554 सहायक प्रोफेसरों और 40 प्राचार्यों की नियुक्तियाँ शामिल हैं। विश्वविद्यालय स्तर पर 294 सहायक प्रोफेसर 162 एसोसिएट प्रोफेसर और 52 प्रोफेसर नियुक्त किए गए।इसके अलावा 479 गैर-शैक्षणिक पदों जिनमें ग्रुप-ए के अधिकारी भी शामिल हैं की नियुक्तियाँ गईं।इससे विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे को और अधिक सक्षम एवं सुदृढ़ बनाने में मदद मिली।शिक्षण एवं गैर-शिक्षण संवर्गों में बड़े पैमाने पर हुई पदोन्नतियाँ भी इस कार्यकाल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही हैं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 12,213 पदोन्नतियाँ की गईं। इनमें 127 शिक्षकों को वरिष्ठ प्रोफेसर के पद पर पदोन्नत किया जाना विशेष रूप से उल्लेखनीय है।इन नियुक्तियों और पदोन्नतियों ने न केवल विश्वविद्यालय की मानव संसाधन क्षमता को मजबूत किया,बल्कि शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।16,000 परिवार: केवल एक संख्या नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक!

यहाँ नेतृत्व का मानवीय पक्ष दिखाई देता है। प्रोफेसर योगेश सिंह, आपने नियुक्तियों को रोजगार से आगे बढ़ाकर अवसर बनाया और पदोन्नतियों को प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर मानवीय सम्मान में बदला।

प्रो.योगेश सिंह के प्रथम कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक संरचना का उल्लेखनीय विस्तार हुआ। फैकल्टी ऑफ टेक्नोलॉजी, हिंदू अध्ययन,जनजातीय अध्ययन,स्वतंत्रता एवं विभाजन अध्ययन तथा बौद्ध अध्ययन जैसे नए केंद्र,इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो मेडिकल साइंसेज और दिल्ली स्कूल ऑफ एनालिटिक्स जैसी पहलें इस बात का संकेत हैं कि विश्वविद्यालय पारंपरिक विषयों से आगे बढ़कर उभरते हुए ज्ञान क्षेत्रों को स्थान दे रहा है।दो नए महाविद्यालयों की स्थापना, फैकल्टी ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली विश्वविद्यालय कंप्यूटर सेंटर, यूनिवर्सिटी स्कूल, हेल्थ सेंटर,नए छात्रावासों तथा फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स सहित विभिन्न संस्थानों के लिए नए बुनियादी ढाँचे का निर्माण इस विस्तार को भौतिक रूप भी देता है।यह केवल निर्माण नहीं है।यह एक विश्वविद्यालय के भविष्य का निर्माण है।

नई शिक्षा,नए भारत के लिए:-अकादमिक विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष नए कार्यक्रमों की शुरुआत है।पाँच वर्षीय एकीकृत BA LL.B.(Hons.)और BBA LL.B. (Hons.),चार वर्षीय Integrated Teacher Education Programme (ITEP), इंजीनियरिंग में नए B.Tech कार्यक्रम, हिंदू अध्ययन में M.A.और Ph.D., रूसी, चीनी और कोरियाई भाषाओं के नए कार्यक्रम, Respiratory Therapy, Psychiatric Mental Health, Public Health, Business Analytics, Orthodontics, Neurosurgery और Psychiatry जैसे समकालीन कार्यक्रम इस बदलाव की व्यापकता को दर्शाते हैं।विश्वविद्यालय का भविष्य केवल अधिक विद्यार्थियों को प्रवेश देने में नहीं है।बल्कि इस बात में है कि हम विद्यार्थियों को भविष्य के भारत के लिए किस प्रकार तैयार कर रहे हैं।यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है,तो उसे केवल डिग्रीधारी युवाओं की नहीं,बल्कि रचनात्मक,तकनीकी रूप से सक्षम,उद्यमशील, शोध-उन्मुख और मूल्य-आधारित मानव शक्ति की आवश्यकता होगी। दिल्ली विश्वविद्यालय इस दिशा में अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित करता दिखाई देता है।NEP 2020: पाठ्यक्रम से आगे की यात्रा:-NEP 2020 केवल पाठ्यक्रम बदलने की नीति नहीं है। यह भारतीय उच्च शिक्षा की पूरी अकादमिक संरचना को पुनर्विचार करने का अवसर है।

नई अकादमिक संरचनाएँ, बहुविषयक दृष्टिकोण, Value Added Courses और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े पाठ्यक्रमों का विस्तार इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेष रूप से Indian Knowledge System को अकादमिक विमर्श में अधिक स्थान मिलना उस व्यापक परिवर्तन का संकेत है जिसमें भारतीयता और वैश्विकता को विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक माना जा रहा है।दिल्ली विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक Vice-Regal Lodge,जिसे विश्वविद्यालय में स्नेहपूर्वक “White House” कहा जाता है, इस पूरे परिवर्तन का प्रतीक जैसा लगता है। 1902 में निर्मित यह भवन ब्रिटिश भारत के वायसरायों का निवास रहा था।इतिहास के लंबे गलियारों से गुजरते हुए यही परिसर आज नए भारत के विश्वविद्यालय की अकादमिक आकांक्षाओं का साक्षी है।एक ओर विरासत है,दूसरी ओर तकनीक।एक ओर गांधी और भारतीय ज्ञान परंपरा है,दूसरी ओर Artificial Intelligence,Analytics और Nano Medical Sciences।

एक ओर शताब्दी की स्मृति है,दूसरी ओर 2047 का सपना।शायद यही आधुनिक दिल्ली विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी विशेषता है—विरासत को बचाते हुए भविष्य का निर्माण।

राष्ट्रीय संस्थान से वैश्विक विश्वविद्यालय की ओर:-

विश्वविद्यालय की वैश्विक रैंकिंग में सुधार भी उल्लेखनीय है।दिल्ली विश्वविद्यालय की रैंकिंग लगभग 550 के आसपास से सुधरकर 328 तक पहुँची है।रैंकिंग अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती।विश्वविद्यालय की वास्तविक पहचान उसके ज्ञान,शोध,शिक्षण और समाज के प्रति योगदान से बनती है।फिर भी वैश्विक रैंकिंग में सुधार यह संकेत देता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय दृश्यता और संस्थागत प्रदर्शन में सकारात्मक बदलाव आया है।

दूसरा कार्यकाल: उपलब्धियों से विरासत तक,पहला कार्यकाल परिवर्तन की शुरुआत कर सकता है।दूसरा कार्यकाल उस परिवर्तन को संस्थागत संस्कृति में बदलने का अवसर देता है।अब दिल्ली विश्वविद्यालय के सामने नई चुनौतियाँ हैं—अनुसंधान की गुणवत्ता और प्रभाव बढ़ाना,शिक्षण-अधिगम के परिणामों को मजबूत करना,अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का विस्तार करना,नवाचार एवं उद्यमिता को बढ़ावा देना, उद्योग-अकादमिक संबंधों को मजबूत करना, अंतर्विषयक अनुसंधान को नई गति देना और विद्यार्थियों के लिए अधिक समावेशी तथा प्रभावी support systems विकसित करना। इसके साथ एक और महत्वपूर्ण चुनौती है—दिल्ली विश्वविद्यालय की आत्मा को सुरक्षित रखना। विश्वविद्यालय केवल भवनों से नहीं बनता। विश्वविद्यालय अपने शिक्षकों,विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं,कर्मचारियों, परंपराओं, विमर्शों,विचारों और स्वतंत्र बौद्धिक वातावरण से बनता है। इसलिए विकास का अगला चरण केवल “more” नहीं होना चाहिए। उसे “better, deeper and global” होना चाहिए।

उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के समकालीन इतिहास में अपना एक स्पष्ट पैटर्न छोड़ा है—विस्तार का, नियुक्तियों का,अकादमिक विविधीकरण का,बुनियादी ढाँचे का,नई शिक्षा का और बदलती राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ विश्वविद्यालय को जोड़ने का।वह निरंतर नए मापदंड गढ़ रहे हैं।वह सकारात्मक सोच के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय को विश्व पटल पर नई पहचान दिला रहें हैं।और अंततःप्रोफेसर योगेश सिंह एक पैटर्न छोड़ते हैं।

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