एवीके न्यूज सर्विस
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एक अनोखी दास्तान : इतिहास, विरासत, संघर्ष और आत्मअन्वेषण का जीवंत संस्मरण
(2) क्या अब भारत की आरक्षण व्यवस्था के व्यापक पुनर्मूल्यांकन का समय आ गया है…?
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एवीके न्यूज सर्विस
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पुस्तक समीक्षा
एक अनोखी दास्तान : इतिहास, विरासत, संघर्ष और आत्मअन्वेषण का जीवंत संस्मरण
समीक्षक: उमेश कुमार सिंह
आत्मकथा तब साहित्य की उत्कृष्ट विधा बन जाती है जब वह किसी व्यक्ति विशेष के जीवन तक सीमित न रहकर अपने समय, समाज और इतिहास की सजीव गवाही प्रस्तुत करे। वरिष्ठ लेखक लव भार्गव की पुस्तक “एक अनोखी दास्तान” ऐसी ही एक प्रभावशाली कृति है, जो पाठक को केवल लेखक के जीवन-संस्मरणों से नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास की बहुआयामी यात्रा से भी परिचित कराती है। डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक संस्मरण, इतिहास और आत्मचिंतन का ऐसा समन्वय प्रस्तुत करती है, जो इसे समकालीन हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय कृतियों में स्थान दिलाता है।
पुस्तक की शुरुआत लेखक के गौरवशाली पारिवारिक इतिहास से होती है। मुंशी नवल किशोर जैसे महान प्रकाशक की विरासत से जुड़ा परिवार भारतीय प्रकाशन जगत का एक स्वर्णिम अध्याय रहा है। लेखक ने नवल किशोर प्रेस की स्थापना, भारतीय भाषाओं के हजारों ग्रंथों के प्रकाशक, धार्मिक और साहित्यिक धरोहरों के संरक्षण तथा ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के अद्वितीय प्रयासों का विस्तृत उल्लेख किया है। “बचपन की फुसफुसाहटें” अध्याय भावनात्मक संवेदनाओं से भरपूर है। लेखक अपने बचपन की स्मृतियों, लखनऊ की तहजीब, विशाल हवेली, पारिवारिक संबंधों, अनुशासन, भय, प्रेम और संस्कारों का इतना सजीव चित्र खींचते हैं कि पाठक स्वयं उस दौर में पहुंच जाता है। पुराने नौकर, ऐतिहासिक प्रिंटिंग प्रेस, पारिवारिक तनाव, स्कूल जीवन, पालतू पशुओं से जुड़ी घटनाएं और माता-पिता के साथ बिताए गए पल इस अध्याय को अत्यंत मानवीय बना देते हैं। लेखक की आत्मीय शैली पाठक को भावनात्मक रूप से पुस्तक से जोड़ देती है।
लखनऊ इस पुस्तक का एक मौन लेकिन प्रभावशाली पात्र है। लेखक ने शहर को केवल भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, नवाबी विरासत, साहित्यिक परंपरा, खानपान, स्थापत्य और सामाजिक जीवन के साथ प्रस्तुत किया है। विलियम रसेल, अब्दुल हलीम शरर, योगेश प्रवीण तथा अन्य विद्वानों के उल्लेख पुस्तक की ऐतिहासिक विश्वसनीयता को और सुदृढ़ करते हैं। लखनऊ के प्रति लेखक का आत्मीय लगाव हर पृष्ठ पर महसूस किया जा सकता है।
“जवानी की गर्मी” पुस्तक को नई ऊर्जा प्रदान करती है। यही वह चरण है जहां लेखक का संघर्षशील, जिज्ञासु और प्रयोगधर्मी व्यक्तित्व पूरी तरह उभरकर सामने आता है। फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में चयन, यश चोपड़ा, रोमेश शर्मा, दुर्गा खोटे, शंकर-जयकिशन, मोहम्मद रफी, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, बेगम अख्तर, अनूप जलोटा, वैजयंतीमाला और पद्मा सुब्रह्मण्यम जैसी विभूतियों से जुड़े संस्मरण पुस्तक को अत्यंत रोचक बना देते हैं। लेखक इन घटनाओं का वर्णन बिना किसी अतिशयोक्ति के करते हैं, जिससे उनकी प्रस्तुति स्वाभाविक और विश्वसनीय प्रतीत होती है।
यह पुस्तक केवल साहित्य और फिल्म जगत तक सीमित नहीं रहती। राजनीति, उद्योग, व्यापार, सामाजिक सेवा, चिकित्सा, अंतरराष्ट्रीय संबंध और विदेश यात्राओं से जुड़े अनुभव इसे बहुआयामी बनाते हैं। लौह अयस्क व्यापार, मध्य अफ्रीकी गणराज्य से जुड़े कूटनीतिक प्रयास, स्वास्थ्य क्षेत्र में लैप्रोस्कोपी कार्यक्रम के विस्तार तथा विभिन्न व्यावसायिक प्रयोगों की सफलता-असफलता लेखक ने पूरी ईमानदारी से साझा की है। इससे स्पष्ट होता है कि उनका जीवन अनेक क्षेत्रों के अनुभवों से समृद्ध रहा है।
भाषा इस पुस्तक की प्रमुख शक्ति है। सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और संवादात्मक शैली पाठक को आरंभ से अंत तक बांधे रखती है। ऐतिहासिक तथ्यों और व्यक्तिगत संस्मरणों के बीच लेखक ने संतुलन बनाए रखा है। कहीं-कहीं अंग्रेजी शब्दों और विदेशी संदर्भों का प्रयोग अवश्य है, लेकिन वह कथ्य की स्वाभाविकता को प्रभावित नहीं करता। संस्मरणात्मक शैली के कारण पाठक को ऐसा अनुभव होता है मानो लेखक स्वयं सामने बैठकर अपने जीवन की कथा सुना रहे हों।
लेखक की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आत्मस्वीकृति और निष्पक्षता है। उन्होंने केवल उपलब्धियों का वर्णन नहीं किया, बल्कि अपनी असफलताओं, पारिवारिक मतभेदों, आर्थिक चुनौतियों, अधूरे सपनों और भावनात्मक संघर्षों को भी पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया है। यही स्पष्टवादिता इस आत्मकथा को विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाती है। पुस्तक में भारतीय समाज के बदलते स्वरूप, शिक्षा, संस्कृति, तकनीकी विकास और भविष्य की संभावनाओं पर भी लेखक ने अपने विचार रखे हैं। नई पीढ़ी, तकनीकी क्रांति, उद्यमिता और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उनके विचार पुस्तक को केवल अतीत की यात्रा नहीं रहने देते, बल्कि वर्तमान और भविष्य से भी जोड़ते हैं। यही इसकी समकालीन प्रासंगिकता है।
यद्यपि पुस्तक का अधिकांश भाग अत्यंत रोचक है, फिर भी कुछ स्थानों पर घटनाओं और व्यक्तियों का विवरण अपेक्षाकृत लंबा हो जाता है। सामान्य पाठक के लिए इतने अधिक नाम और प्रसंग याद रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि कुछ अध्यायों का संपादन थोड़ा और संक्षिप्त होता तो पुस्तक की गति और प्रभाव और अधिक सशक्त हो सकते थे। हालांकि यह कमी इसकी समृद्ध सामग्री और ऐतिहासिक महत्व के सामने बहुत छोटी प्रतीत होती है।
“एक अनोखी दास्तान” केवल एक व्यक्ति की जीवन यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज, साहित्य, राजनीति, प्रकाशन, संस्कृति और बदलते समय का बहुआयामी दस्तावेज है। इतिहास, संस्मरण, आत्मचिंतन और प्रेरणा का यह संगम इसे विशेष बनाता है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो भारतीय इतिहास, लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत, प्रकाशन जगत, संस्मरण साहित्य और व्यक्तित्व विकास में रुचि रखते हैं। डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह कृति समकालीन हिंदी संस्मरण साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है। लव भार्गव ने अपने अनुभवों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि किसी व्यक्ति का जीवन केवल निजी घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह अपने युग का जीवंत इतिहास भी होता है।
यदि आप ऐसी आत्मकथा पढ़ना चाहते हैं जिसमें इतिहास की गंभीरता, साहित्य की संवेदना, संस्कृति की गहराई, राजनीति की झलक, फिल्म जगत के रोचक संस्मरण, व्यापारिक अनुभव और जीवन दर्शन का अद्भुत समन्वय हो, तो “एक अनोखी दास्तान” निश्चित रूप से आपकी पुस्तक-सूची में शामिल होनी चाहिए। यह केवल पढ़ने योग्य नहीं, बल्कि संग्रहणीय पुस्तक है, जो पाठक को अतीत से जोड़ते हुए भविष्य की ओर सोचने के लिए प्रेरित करती है।
पुस्तक: एक अनोखी दास्तान
लेखक: लव भार्गव
प्रकाशक: डायमंड पॉकेट बुक्स
समीक्षक: उमेश कुमार सिंह
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1 से 7 अगस्त विश्व स्तनपान दिवस :
माँ का अमृत, शिशु का प्रथम अधिकार
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
माँ का दूध केवल आहार नहीं, बल्कि जीवन का प्रथम संस्कार है। यह प्रकृति द्वारा नवजात शिशु को दिया गया ऐसा अमूल्य उपहार है, जिसका कोई विकल्प नहीं हो सकता। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 1 से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है, ताकि समाज में स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़े और प्रत्येक शिशु को उसके जीवन के इस प्रथम अधिकार से वंचित न होना पड़े।
आज विज्ञान भी इस सत्य की पुष्टि करता है कि जन्म के पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान प्रारम्भ करना तथा पहले छह माह तक केवल माँ का दूध देना शिशु के लिए सर्वोत्तम पोषण और सुरक्षा कवच है। माँ के दूध में ऐसे प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी), प्रोटीन, विटामिन, खनिज तथा आवश्यक पोषक तत्व होते हैं जो शिशु को संक्रमणों से बचाते हैं और उसके शारीरिक एवं मानसिक विकास को गति देते है।
स्तनपान का लाभ केवल शिशु तक सीमित नहीं है। यह माँ के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। नियमित स्तनपान से प्रसव के बाद शरीर शीघ्र सामान्य होता है तथा स्तन एवं अंडाशय के कैंसर सहित कुछ अन्य रोगों का जोखिम कम होने के प्रमाण मिले है।
दुर्भाग्य से आधुनिक जीवनशैली, गलत धारणाएँ, कार्यस्थलों पर पर्याप्त सुविधाओं का अभाव तथा कृत्रिम दूध के बढ़ते प्रचार के कारण अनेक माताएँ समय से पहले स्तनपान छोड़ देती हैं। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। आवश्यक है कि परिवार, समाज, स्वास्थ्य संस्थान और कार्यस्थल मिलकर माताओं को ऐसा वातावरण दें, जहाँ वे बिना किसी संकोच और बाधा के स्तनपान करा सकें।
स्तनपान केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि माँ और शिशु के बीच भावनात्मक विश्वास का सबसे मजबूत सेतु भी है। माँ की धड़कन, उसका स्पर्श और उसका स्नेह, शिशु के व्यक्तित्व की पहली पाठशाला बन जाते हैं।
स्तनपान दिवस हमें यह संकल्प लेने की प्रेरणा देता है कि प्रत्येक नवजात को जीवन का यह प्राकृतिक अधिकार मिले। स्वस्थ माँ, स्वस्थ शिशु और स्वस्थ राष्ट्र का आधार भी यही है। जब हम स्तनपान को बढ़ावा देते हैं, तब हम केवल एक बच्चे का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर रहे होते हैं।
“माँ का दूध अमृत है,
जीवन का प्रथम उपहार।
स्वस्थ शिशु, स्वस्थ समाज का,
यही है सच्चा आधार।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”, एवीके न्यूज सर्विस
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क्या अब भारत की आरक्षण व्यवस्था के व्यापक पुनर्मूल्यांकन का समय आ गया है…?
भारत का संविधान समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समता का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसी उद्देश्य से स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा बाद में अन्य पिछड़ा वर्ग सहित विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। उस समय इसका उद्देश्य उन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और शासन-प्रशासन में अवसर प्रदान करना था जो सदियों से सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित रहे थे।
समय के साथ देश बदला, समाज बदला और अनेक आरक्षित वर्गों के परिवार शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, राजनीति और व्यापार जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर चुके हैं। ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है – क्या वर्तमान स्वरूप में आरक्षण व्यवस्था का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए?
यह प्रश्न किसी वर्ग का विरोध नहीं है, बल्कि सार्वजनिक नीति की समीक्षा का प्रश्न है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियाँ स्थायी नहीं होतीं; बदलती परिस्थितियों के अनुरूप उनका परीक्षण और आवश्यक संशोधन लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
आज समाज के एक वर्ग का यह मत सामने आता है कि कई ऐसे परिवार, जो वर्षों से आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक और सामाजिक रूप से अत्यंत सक्षम हो चुके हैं, उनकी अगली पीढ़ियाँ भी उसी लाभ को प्राप्त कर रही हैं। दूसरी ओर अनेक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार, जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते, सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं। इस स्थिति ने अवसरों की समानता पर नई बहस को जन्म दिया है।
यह भी सत्य है कि डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायिक अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य जिम्मेदार पदों पर नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति से समाज उच्चतम स्तर की दक्षता और उत्तरदायित्व की अपेक्षा करता है। इसलिए चयन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखे। आज के वह वैविध्य और व्यापक आधुनिक परिवेश यह भी पूरी शिद्दत से देखने में आ रहा है कि दक्ष और योग्य व्यक्ति जिम्मेदार और अहम पद पर नहीं होने से गहरे नकारात्मक स्थिति उत्पन्न हो रहें है। यह ऐसा संकेत है जो हमें सावधान करने के लिए पर्याप्त है।
मेरे विचार से अब आवश्यकता आरक्षण को केवल समाप्त करने या बनाए रखने की बहस तक सीमित रहने की नहीं है, बल्कि उसकी व्यापक समीक्षा की है। यह विचार किया जा सकता है कि जिन परिवारों ने लंबे समय से आरक्षण का लाभ लेकर पर्याप्त सामाजिक और आर्थिक प्रगति कर ली है, क्या उन्हें उसी रूप में निरंतर लाभ मिलना चाहिए, या फिर नीति का लाभ उन परिवारों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचना चाहिए जो आज भी वास्तविक रूप से वंचित हैं।
साथ ही, आर्थिक रूप से कमजोर नागरिक, महिलाएँ, दिव्यांगजन, भूतपूर्व सैनिक, अनाथ, अत्यंत पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले परिवार तथा अन्य वास्तविक जरूरतमंद वर्गों को प्राथमिकता देने जैसे विकल्पों पर भी गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए। इससे सामाजिक न्याय का उद्देश्य और अधिक व्यापक रूप में साकार हो सकता है।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि इस विषय पर किसी भी प्रकार की चर्चा संवैधानिक मर्यादा, सामाजिक सौहार्द और परस्पर सम्मान के साथ हो। किसी भी वर्ग की गरिमा को आहत किए बिना नीति की समीक्षा करना ही लोकतंत्र की शक्ति है।
भारत का भविष्य ऐसी व्यवस्था में निहित है जहाँ सामाजिक न्याय और योग्यता दोनों एक-दूसरे के पूरक बनें, प्रतिस्पर्धी नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि नीति का लाभ वास्तव में उन तक पहुँचे जिन्हें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, साथ ही सभी नागरिकों को अपनी प्रतिभा और परिश्रम के आधार पर आगे बढ़ने का समान अवसर मिले।
“संविधान की आत्मा सामाजिक न्याय है और लोकतंत्र की आत्मा समान अवसर। यदि समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं तो नीतियों की समीक्षा भी लोकतांत्रिक परंपरा का ही हिस्सा होती है। प्रश्न आरक्षण के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था के निर्माण का है जिसमें सामाजिक न्याय, योग्यता और अवसर, इन तीनों का संतुलन बना रहे।”
पाठकों से एक प्रश्न
यह लेख मेरे व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है। मेरा उद्देश्य किसी वर्ग का विरोध करना नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय विषय पर सकारात्मक संवाद को आगे बढ़ाना है। अब यह प्रश्न में अपने सभी पाठक साथियों विचारों पर पर भी छोड़ता हूं कि ..क्या आपको लगता है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कर उसे बदलती सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिए? या आप मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था ही सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक है? अपने विचार अवश्य साझा करें। स्वस्थ संवाद ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
न्याय वही जो सबको अवसर, सबका हो सम्मान,
मेहनत का भी ऊँचा हो फिर, भारत में स्थान।
विमर्शों से ही राह निकले, मतभेदों से नहीं,
समरसता की ज्योति जले, यही हो देश की शान।।
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’, एवीके न्यूज सर्विस

