(कुशीनगर) योगी सरकार में सरकारी जमीन पर ग्राम प्रधान का दूसरे गांव में कैसे हुआ सरकारी पट्टा ? कब होगी कार्रवाई
—- सरकारी जमीन के पट्टे में प्रधान और लेखपाल की खेल? एंटी भू-माफिया अभियान को खुली चुनौती।
कुशीनगर, 23 अक्टूबर (आरएनएस)। दूसरे गांव भिसला लाला के ग्राम प्रधान को सोहरौना गांव में सरकारी जमीन का पट्टा किस आधार पर आवंटित किया गया और इसकी पात्रता की जांच कर किस लेखपाल ने रिपोर्ट लगाई? अपने आप में गंभीर सवाल बना है। योगी सरकार में पडरौना विकास खंड क्षेत्र के भिसवा लाला के ग्राम प्रधान द्वारा नियम विरुद्ध तरीके से दूसरे गांव में अपने नाम से बेशकीमती सरकारी भूमि का पट्टा हासिल करने और बेदखली के बाद दोबारा सरकारी जमीन पर कब्जा करने के आरोप ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया हैं। बताया जा रहा है कि तत्कालीन एसडीएम ने पट्टे को नियम विरुद्ध मानते हुए कब्जा हटवाया था। बावजूद इसके प्रधान ने धनबल के दम पर दोबारा उस जमीन पर कब्जा कर लिया है। ऐसे में सवाल यह है कि दूसरे गांव के व्यक्ति को पट्टा देने की संस्तुति किस आधार पर की गई? पात्रता की जांच किसने की, लेखपाल ने क्या रिपोर्ट लगाई और राजस्व अधिकारियों ने उस रिपोर्ट के आधार पर पट्टा कैसे स्वीकृत कर दिया? यदि बेदखली के बाद दोबारा कब्जा हुआ है, तो इसकी जानकारी राजस्व विभाग को क्यों नहीं हुई और सरकारी जमीन को कब्जामुक्त रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की है?
ज्ञातव्य हो कि इस पूरे प्रकरण में ग्राम प्रधान रफीक अंसारी और संबंधित लेखपाल मार्कण्डेय मणि के मिली भगत की आशंका की जांच जरूरी है। जब पट्टा दूसरे गांव में आवंटित हुआ, तो रफीक की पात्रता का सत्यापन किसने किया? लेखपाल ने क्या रिपोर्ट लगाई, किस आधार पर रिपोर्ट लगाई गई और उच्चाधिकारियों ने उस रिपोर्ट के आधार पर पट्टा कैसे स्वीकृत किया? यदि आवंटन नियम विरुद्ध है, तो उसकी जिम्मेदारी सिर्फ पट्टाधारक तक सीमित नहीं रह सकती, पट्टा प्रक्रिया में शामिल राजस्वकर्मियों और उसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। अब जरूरत इस बात की है कि पट्टा आवंटन की मूल पत्रावली, लेखपाल की रिपोर्ट, एसडीएम के आदेश और वर्तमान कब्जे की स्थिति की जांच कराई जाए, ताकि सरकारी जमीन के मामले में कथित मिलीभगत और जिम्मेदारों की भूमिका स्पष्ट हो सके। यही वजह है कि भिसवा लाला के ग्राम प्रधान के नाम सोहरौना गांव में हुए पट्टे का मामला इस पूरे प्रकरण का अहम पहलू है। ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर किस नियम और पात्रता के आधार पर यह पट्टा आवंटित किया गया। क्या इसके लिए विधिवत प्रस्ताव पारित हुआ था? भूमि की श्रेणी क्या है? आवंटन की संस्तुति किसने की और सक्षम अधिकारी ने किस आधार पर स्वीकृति दी?जानकारो का कहना है कि प्रशासन को पट्टा आवंटन की मूल पत्रावली, प्रस्ताव, स्वीकृति आदेश और संबंधित भूमि के राजस्व रिकॉर्ड की पड़ताल करनी चाहिए। यदि प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी तय होनी चाहिए। सूत्रों के हवाले से कथित पट्टा कराने के लिए संबंधित लेखपाल को मोटी रकम दिए जाने का आरोप लगाया गया है। हालांकि इस आरोप की पुष्टि करने वाला स्वतंत्र साक्ष्य सामने आना जरूरी है। ऐसे में जांच एजेंसी को यह पता लगाना चाहिए कि पट्टे की प्रक्रिया में किस स्तर पर क्या कार्रवाई हुई, मौके की रिपोर्ट किसने तैयार की और आवंटन के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। यदि रिश्वत के आरोपों के समर्थन में साक्ष्य मिलते हैं तो मामले को सक्षम भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी के समक्ष ले जाकर नियमानुसार जांच कराई जानी चाहिए। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रधान रफीक के पिता और भाई के नाम भी सरकारी जमीन के पट्टा हुआ हैं। इसकी भी जांच जरूरी है।
इनसेट– एंटी भू-माफिया अभियान के बीच कार्रवाई का इंतजार:- योगी सरकार मे सरकारी जमीनों से अवैध कब्जा हटाने व नियम विरुद्ध तरीके से सरकारी जमीन हथियाने वाले के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में भिसवा लाला और सोहरौना से जुड़े आरोपों की जांच केवल औपचारिक रिपोर्ट तक सीमित होने का सवाल ही नही बनता है। पहले यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि संबंधित भूमि सरकारी है या नहीं, उसका पट्टा किन नियमों के तहत हुआ और कहीं आवंटन अथवा कब्जे में अनियमितता तो नहीं है। यदि जांच में अवैध कब्जा या नियमविरुद्ध आवंटन प्रमाणित होता है तो सक्षम प्राधिकारी को कानून के अनुसार कार्रवाई करने मे हिला हवाली जी-जंजाल बन जाये
गा।

