पहले अपराधियों को पकड़ने के लिए थानों पर होते थे मुखबिर अब इनकी जगह होते हैं दलाल

पहले अपराधियों को पकड़ने के लिए थानों पर होते थे मुखबिर अब इनकी जगह होते हैं दलाल

(राजेश श्रीवास्तव ब्यूरो चीफ)

अयोध्या।जब समाज में कोई भी व्यक्ति अपनों या दूसरों से ठुकराया जाता है तो वह सीधे सबसे पहले पुलिस के पास जाता है और वहां यह सोचकर जाता है की पुलिस के माध्यम से उसे न्याय मिलेगा।इसके साथ साथ पुलिस अपराधियों को शीघ्र से शीघ्र पकड़ भी लेती थे क्योंकि पहले संबंधित थानों के थानेदार मुखबिर पालते थे अब देखा जाए उन्हीं थानों पर मुखबिर की जगह दलाल के रूप में लोग बैठे रहते हैं।वैसे तो आज भी पुलिस के बिना लगभग कोई कार्य नहीं होता है।पुलिस समाज का एक मजबूत विभाग और कार्य करने की पॉवरफुल सेंटर है।पुलिस द्वारा किए जाने वाले हर कार्य को जनता शासन प्रशासन और सरकार की छवि को देखती है।कुछ वर्दी छबि को कलंकित करती है तो कई ऐसी हस्तियां है जो सदैव वर्दी की लाज बचाने के लिए हर पल काम करते हैं और वह समाज के आईकॉन जाते है।लेकिन पुलिस विभाग में एक सबसे बड़ी दुरुव्यवस्था देखी जा रही बन है जो राजनीति में दिखती है।यहां भी अब योग्यता और कार्यशैली पर कुर्सी नहीं मिलती है केवल चापलूसी और लक्ष्मी को कृपा के आधार पर कुर्सियों का बंटवारा होता है,जिसके कारण अच्छे और काम करने वालों के मंशा पर कुठाराघात होता है। बाहर से आने वाले अच्छे दारोगा और सिपाही जिराकी कोई रोटिंग नहीं होती है महीनों पुलिस लाइन में पड़े रहते हैं। जबकि कई ऐसे अधिकारी है जो सालों से कुर्सी पर चिपके रहते हैं, उनके पता पास नहीं कौन सा फेबीकोल कुर्सी पर लगा होता है, कि उन पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता है।आज भी पुलिस की छबि आज भी समाज में एक अच्छे कार्य और हर पल मदद के रूप में देखी जाती है, लेकिन कुछ सालों से पुलिस की छवि को बटटा लगना शुरू हुआ है, जो कभी पुलिस अपने कार्यों से जानी जाती थी,अब चंद अधिकारी थानों और चौकियों पर चंद दलालों और कुछ खारा लोगों के ही ईशारे पर कार्य करते है।जिसका असर आम जनता और गरीबों पर पड़ता है।थानों और चौकियों पर विराजमान अधिकारियों की आंख नाक और कान के ऐसे लोग बन जाते हैं जो न तो पुलिस विभाग के खास होते हैं न ही समाज के लेकिन वह दिन में दो से चार बार थानों का चक्कर काटते हैं।जो पीड़ित या फरियादी आया होता है तो सबसे पहले वह देखता है कि यह तो थानेदार का खास आदमी है, इसे ही पकड़े।पहले क्राइम कंट्रोल के लिए पुलिस मखबिर रखती थी, साइकिल से गांव गांव व चौराहों पर सादी वर्दी में भी चक्कर लगाती थी, अब सब बाइक सवार हो चुके हैं,अब मुखबिर कम दलाल अधिक पाले हुए हैं।कई ऐसे छोटे मोटे कार्य है जो बिना पुलिस के नही होते है पुलिस की भूमिका से ही वहां पर न्याय होने की संभावना होती है लेकिन जैसे ही दलालों की इंट्री होती है तो बहां पर चेहरा और लक्ष्मी को की महत्व दिया जाता है। इससे पुलिस छवि को खराब करने के साथ ही वर्तमान सरकारों की छवि को खराब करने का काम होता है।

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