शादी की सालगिरह पर मरीजों के बीच बांटे फल, संदेश फाउंडेशन की पहल की सराहना
सुल्तानपुर। राजकीय स्वाशासी मेडिकल कॉलेज सुल्तानपुर में मंगलवार को मानवता की मिसाल देखने को मिली। संदेश फाउंडेशन के बैनर तले अजीत यादव उर्फ अज्जू फौजी ने अपनी शादी की सालगिरह के अवसर पर मेडिकल कॉलेज में भर्ती मरीजों के बीच फल वितरित किए। इस दौरान फाउंडेशन के सदस्यों ने वार्डों में जाकर मरीजों से हाल-चाल पूछा और उन्हें फल भेंट किए। मरीजों एवं संगठन के अध्यक्ष प्रदीप यादव,डॉ.सुरेश यादव, राजेश यादव,पवन यादव, मास्टर दिनेश यादव, पत्रकार विनोद यादव, ज्ञानसिंह यादव,डॉ.राममूरत प्रजापति, मास्टर सुरेंद्र यादव, सुरेश शर्मा, पत्रकार अंकुर शर्मा,समाजसेवी राकेश वर्मा ने भी अजीत यादव, (अज्जू फौजी) को शादी की सालगिरह की बधाई दी और उनके सुखी दांपत्य जीवन की कामना की।अजीत यादव ने कहा कि शादी की सालगिरह को सिर्फ जश्न मनाकर नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सेवा करके मनाना ही सच्ची खुशी है। मरीजों के चेहरे पर मुस्कान ही सबसे बड़ा तोहफा है। उन्होंने कहा कि संदेश फाउंडेशन आगे भी इस तरह के सेवा कार्य करता रहेगा।इस मौके पर संदेश फाउंडेशन के पदाधिकारी अध्यक्ष प्रदीप यादव व सदस्य राव मुकेश यादव, सचिन यादव,मनोज यादव मौजूद रहे। मरीजों और उनके तीमारदारों ने इस पहल की सराहना की।
हाईकोर्ट के निर्देशों की सुल्तानपुर में उड़ी धज्जियां, डीजे की तेज आवाज से थर्राया शहर
जब कानून की आवाज दब गई डीजे के शोर में, तब सवालों के घेरे में खड़ा दिखा पूरा प्रशासन!
सुल्तानपुर। जिस शहर में न्यायालय के आदेशों का सम्मान होना चाहिए, जिस शहर में कानून का राज स्थापित करने की जिम्मेदारी प्रशासन की है, उसी सुल्तानपुर में शाम होते ही तेज डीजे की आवाज और खतरनाक वाइब्रेशन ने लोगों को दहशत और परेशानी में डाल दिया। हालात ऐसे बने कि चौक क्षेत्र तक डीजे के शोर से थर्राता नजर आया।
ऐसा लगा मानो शहर में उत्सव नहीं, बल्कि ध्वनि का कोई बम फोड़ा जा रहा हो। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हाईकोर्ट के निर्देश मौजूद हैं, तो फिर सुल्तानपुर की सड़कों पर उनकी खुलेआम अनदेखी कैसे हुई? क्या न्यायालय के आदेश केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगे? क्या आम नागरिकों को तेज आवाज और खतरनाक वाइब्रेशन के बीच जीने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
सुल्तानपुर पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल
जिस पुलिस प्रशासन पर कानून का पालन कराने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, वह इस पूरे घटनाक्रम में प्रभावी कार्रवाई करती नजर क्यों नहीं आई? तेज आवाज से परेशान नागरिकों, बीमार व्यक्तियों, बुजुर्गों और बच्चों की पीड़ा आखिर किसे सुनाई देगी? जब शहर तेज डीजे की आवाज से गूंज रहा था, तब उसे नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार तंत्र की सक्रियता कहां थी? यदि न्यायालय के निर्देशों के बावजूद ऐसे हालात बनते हैं, तो यह प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
केंद्रीय पूजा समिति और पुलिस की जिम्मेदारी भी कम नहीं!
ऐसे आयोजनों में केंद्रीय पूजा समिति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। आयोजनों को अनुशासित, शांतिपूर्ण और जनहित के अनुरूप संपन्न कराने में समिति और पुलिस प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय अपेक्षित है। लेकिन जब तेज डीजे की आवाज शहर की शांति को भंग करे और नागरिकों को परेशानी झेलनी पड़े, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केंद्रीय पूजा समिति और पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे? आस्था का अर्थ किसी दूसरे व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाना नहीं है। उत्सव का अर्थ यह नहीं कि बीमारों की तकलीफ, बुजुर्गों की बेचौनी, बच्चों की परेशानी और आम नागरिकों के सुकून को नजरअंदाज कर दिया जाए। तेज ध्वनि केवल शोर नहीं होती। कुछ परिस्थितियों में यह स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए गंभीर परेशानी पैदा कर सकती है। हृदय रोगियों, ध्वनि के प्रति संवेदनशील लोगों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए ऐसे हालात विशेष रूप से कष्टदायक हो सकते हैं। जिन परिवारों ने तेज डीजे की वजह से अपने प्रियजनों को खोने का दावा किया है, जिन लोगों को सुनने संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा है और जो बीमार व्यक्ति ऐसे शोर में बेबस होकर रात गुजारते हैं, उनकी पीड़ा को आखिर कब समझा
जाएगा?

