तीन जिंदगियां निगल गए खुले तालाब, हादसे के बाद भी नहीं जागा प्रशासन!
-नेशनल हाईवे से गांवों की सड़कों तक मौत के मुहाने बने तालाब, कहीं 15 फुट गहराई तो कहीं सड़क से सटा पानी
– पचपीर हादसे में तीन कारोबारियों की मौत के बाद रेलिंग लगाने की मांग तेज
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सीतापुर। सड़क पर सफर करने वाले लोगों को गड्ढों, अंधे मोड़ों और तेज रफ्तार वाहनों से ही नहीं, अब सड़क किनारे बने खुले तालाबों से भी जान का खतरा है। कहीं नेशनल हाईवे के किनारे पानी से लबालब तालाब है तो कहीं गांवों को जोड़ने वाली सड़क के ठीक बगल में गहरी जलराशि। न बाउंड्रीवाल, न रेलिंग और न ही खतरे से आगाह करने वाला कोई इंतजाम। जिम्मेदारों की इसी अनदेखी के बीच कमलापुर थाना क्षेत्र के पचपीर के पास सड़क किनारे तालाब में कार गिरने से तीन कारोबारियों की मौत हो गई। करीब 20 घंटे तक पानी में डूबी कार में तीनों के शव फंसे रहे। इस दर्दनाक हादसे ने जिले की सड़कों के किनारे मौजूद ऐसे खतरनाक तालाबों की ओर फिर ध्यान खींचा है। सिधौली-बिसवां मार्ग पर पचपीर के निकट हुए हादसे ने तीन परिवारों को ऐसा जख्म दिया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। एक पिता बेटे को देखने बहराइच गया था। दो दोस्त उसके साथ थे। तीनों घर लौट रहे थे, लेकिन रास्ते में सड़क किनारे बने तालाब ने उनकी जिंदगी छीन ली। हादसे के बाद सवाल उठना लाजिमी है कि जब सड़क के किनारे खुले तालाब लोगों की जान के लिए खतरा बने हैं, तो वहां सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं किए गये!
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हादसा होने के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?
सीतापुर। यह सवाल अब लोगों के बीच चर्चा का विषय है। क्या प्रशासन किसी और परिवार की खुशियां उजड़ने का इंतजार कर रहा है? सड़क किनारे तालाबों का सर्वे कराकर खतरनाक स्थानों को चिह्नित करने, रेलिंग या मजबूत सुरक्षा दीवार बनवाने और चेतावनी संकेतक लगाने की जरूरत है। खासकर उन रास्तों पर, जहां वाहनों के साथ स्कूली बच्चों और पैदल राहगीरों का भी रोजाना आवागमन होता है। पचपीर का हादसा चेतावनी है कि सड़क किनारे सुरक्षा के इंतजामों को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है। अब जरूरत केवल हादसे की जांच तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि ऐसे सभी स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की है, ताकि किसी दूसरे घर में रातभर इंतजार के बाद मातम न छाए।

