शांतिपूर्वक ढंग से मनाई गई सम्राट अशोक विजया दशमी
शस्त्र त्याग से शांति पथ की ओर इंगित करता है सम्राट अशोक विजया दशमी
प्रयागराज। एक ओर जहां पूरा देश विजय दशमी बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया वहीं प्रयागराज के कुछ तहसीलों के दर्जनों अनुसूचित जाति बाहुल्य बस्तियों में धम्म चक्र प्रवर्तनाय धम्म दीक्षा दिवस के रूप मनाया गया।
डा. अम्बेडकर वेलफेयर नेटवर्क (डान) के संस्थापक उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आईपी रामबृज ने बताया कि विजयदशमी का दिन भारतीय इतिहास में केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का ही प्रतीक नहीं है बल्कि यह दिन वैश्विक इतिहास के सबसे बड़े वैचारिक और हृदय परिवर्तन का भी साक्षी है। आज ही के दिन महान सम्राट अशोक ने युद्ध की राह छोड़कर शांति, करुणा और मानवता का मार्ग अपनाया था, जिसे इतिहास में ‘अशोक विजयादशमी’ के नाम से जाना जाता है।
गौतम ने आगे बताया कि ईसा पूर्व 261 में हुए भयानक कलिंग युद्ध में लाखों लोगों की मृत्यु और तबाही को देखकर सम्राट अशोक का हृदय ग्लानि और शोक से भर गया। उन्होंने महसूस किया कि शस्त्रों से जीती गई भूमि वास्तविक विजय नहीं है। इसके बाद, उन्होंने शस्त्रों का सदा के लिए त्याग कर दिया। कलिंग युद्ध के बाद, इसी पावन विजयदशमी के दिन सम्राट अशोक ने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी।
इस अवसर पर मुख्य आयोजक डा सुशांत रत्न बौद्ध सहयोगीगण रीना राही अम्बेडकर, प्रेमावती, राम भवन, सरला देवी, भोंदल प्रसाद, शान्ति देवी, रवि बौद्ध, मनोहर बौद्ध, तेरसू, कौशलेश, मानिक चन्द्र, विनोद, रामलाल, रमेश चन्द्र, सतीश चन्द, अगमलाल, शिव शिव चन्द्र आदि लोग शामिल
रहें।

