तैयारी अभी से हो तो गर्मियों में पानी की किल्लत नहीं होगी

तैयारी अभी से हो तो गर्मियों में पानी की किल्लत नहीं होगी

रतना गोदारा

लूणकरणसर, राजस्थान

 

गर्मी बढ़ते ही राजस्थान के गांवों में पानी की चर्चा अचानक तेज हो जाती है। लेकिन जैसे ही मानसून आता है, तालाबों और कुओं में पानी दिखाई देने लगता है, संकट की चर्चा भी पीछे छूट जाती है। सवाल यह है कि जल संरक्षण की याद हमें केवल तब क्यों आती है, जब पानी कम पड़ने लगता है? क्या पानी पर्याप्त होने के समय उसके संरक्षण की तैयारी नहीं की जा सकती? राजस्थान जैसे राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है।

 

केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि प्री-मानसून यानी गर्मियों के आसपास भूजल की स्थिति कई इलाकों में बेहद चिंताजनक होती है। वर्ष 2020-21 में मई से मई के बीच राज्य के 68.67 प्रतिशत निगरानी केंद्रों पर भूजल स्तर में गिरावट दर्ज हुई थी। 2021-22 में भी 50.22 प्रतिशत केंद्रों पर गिरावट रही। 2022-23 में यह आंकड़ा 43.63 प्रतिशत, 2023-24 में 35.8 प्रतिशत और 2024-25 में 32 प्रतिशत रहा। भले ही गिरावट वाले केंद्रों का अनुपात कम हुआ है, लेकिन यह तथ्य अब भी चिंता पैदा करता है कि 2024-25 में भी लगभग हर तीन में से एक निगरानी केंद्र पर सालाना भूजल स्तर नीचे गया।

 

सिर्फ प्रतिशत ही समस्या की पूरी तस्वीर नहीं बताते। मई 2024 में राजस्थान के निगरानी केंद्रों पर भूजल की गहराई 0.45 मीटर से लेकर 144.47 मीटर तक दर्ज की गई। मई 2025 में यह सीमा 0.04 मीटर से 142.18 मीटर तक रही। यानी राज्य के कई हिस्सों में पानी जमीन के भीतर इतनी गहराई पर है कि सामान्य ग्रामीण परिवार के लिए उस तक पहुंचना आसान नहीं है।

 

इन आंकड़ों का अर्थ गांव के लिए केवल इतना नहीं है कि कुएं का पानी कुछ मीटर नीचे चला गया। इसका सीधा असर रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। जब पानी दूर हो जाता है तो सबसे पहले घर के काम का समय बढ़ता है। पानी लाने के लिए महिलाओं और लड़कियों को अधिक समय देना पड़ता है। इसका असर उनकी पढ़ाई, काम, आराम और अपनी पसंद के काम करने की स्वतंत्रता पर पड़ता है। पानी की कमी इसलिए केवल प्राकृतिक संसाधन का संकट नहीं है, बल्कि घर के भीतर काम और समय के बंटवारे का भी सवाल है। जिस परिवार में पानी जुटाने के लिए रोज कई घंटे लगाने पड़ते हैं, वहां पानी की उपलब्धता बढ़ाना महिलाओं के जीवन में सीधे बदलाव ला सकता है।

 

राजस्थान में जल संरक्षण के लिए योजनाओं की कमी नहीं है। मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान 2.0 के तहत वर्षा जल को रोकने, भूजल पुनर्भरण बढ़ाने और पुराने जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए एनिकट, चेक डैम, तालाब, जोहड़, खेत तालाब और अन्य संरचनाओं पर काम किया जा रहा है। इसके तहत 20 हजार गांवों में पांच लाख जल संचयन एवं संरक्षण संरचनाएं बनाने का लक्ष्य रखा गया है। पहले चरण में 5,135 गांवों में काम हुआ और एक लाख से अधिक कार्य पूरे किए जाने की जानकारी दी गई है। दूसरे चरण में भी हजारों कार्य स्वीकृत और शुरू किए जा चुके हैं।

 

राजीव गांधी जल संचय योजना भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण पहल रही है। इसका उद्देश्य वर्षा जल संग्रहण, परंपरागत जल स्रोतों का पुनर्जीवन, नए जल स्रोतों का निर्माण और गिरते भूजल स्तर को रोकना रहा है। योजना के पहले चरण में 1,450 ग्राम पंचायतों के 4,029 गांवों में 39,498 कार्य शुरू किए गए थे, जिनमें 31,727 कार्य पूरे होने की जानकारी सरकार ने दी थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जलग्रहण घटक और अटल भूजल योजना जैसी पहलें भी जल संरक्षण, भूजल प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी पर जोर देती हैं।

 

इन योजनाओं से काम तो हुआ है, लेकिन असली चुनौती अब उनके असर को सालभर बनाए रखने की है। किसी गांव में चेक डैम या तालाब बन जाना अपने आप में जल सुरक्षा की गारंटी नहीं है। जरूरी है कि यह देखा जाए कि बारिश के बाद उस संरचना में कितना पानी आया, कितना जमीन में गया, भूजल स्तर में कितना बदलाव हुआ और गर्मी आने तक कितना पानी बचा। अभी भी कई जगह योजनाएं निर्माण-केंद्रित दिखाई देती हैं, जबकि गांव को परिणाम-केंद्रित जल प्रबंधन की जरूरत है।

 

जल संरक्षण को केवल सरकारी विभागों का काम मानना भी सही नहीं होगा। गांव की महिलाओं को जल समितियों और जल प्रबंधन की बैठकों में वास्तविक निर्णयकारी भूमिका मिलनी चाहिए, क्योंकि पानी की कमी का सबसे सीधा अनुभव अक्सर उन्हें ही होता है। वे बता सकती हैं कि कौन-सा कुआं कब सूखता है, किस स्रोत का पानी पीने योग्य है और किस रास्ते से पानी लाने में सबसे अधिक समय लगता है। जिस व्यक्ति का रोजमर्रा का जीवन पानी की उपलब्धता से सबसे अधिक प्रभावित होता है, उसकी आवाज जल योजना के केंद्र में होनी चाहिए।

 

राजस्थान में बारिश कम और अनिश्चित हो सकती है, लेकिन हर बूंद को गांव के भीतर रोकने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। छतों से वर्षा जल संग्रहण, खेतों में छोटे जल-संचयन ढांचे, तालाबों की गाद सफाई, पुराने कुएं और बावड़ियों का पुनर्जीवन, सूखे बोरवेल को रिचार्ज संरचनाओं से जोड़ना और खेतों में कम पानी वाली सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। साथ ही, पानी की उपलब्धता बढ़ने के साथ उसका अनियंत्रित दोहन न हो, इसके लिए भूजल निकासी पर स्थानीय स्तर पर निगरानी भी जरूरी है।

 

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सोच में होना चाहिए। पानी की बचत को गर्मियों की आपातकालीन गतिविधि नहीं, गांव की नियमित व्यवस्था बनाया जाए। जब तालाब भरे हों, कुओं में पानी हो और नल से नियमित आपूर्ति हो, तभी यह पूछा जाए कि अगले मई-जून के लिए हमने कितना पानी बचाया है। संकट आने के बाद टैंकर भेजना जरूरी हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। स्थायी समाधान उस समय तैयार होता है जब संकट दिखाई नहीं दे रहा होता।

(यह ले

खिका के निजी विचार हैं)

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