22 अक्टूबर। लेखिका संघ बरेली क़े तत्वावधान में ग्रीनपार्क कॉलोनी में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता संस्था की संरक्षक श्रीमती निर्मला सिँह ने की तथा मुख्य अतिथि हिमांशु श्रोत्रिय निष्पक्ष रहे

22 अक्टूबर। लेखिका संघ बरेली क़े तत्वावधान में ग्रीनपार्क कॉलोनी में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता संस्था की संरक्षक श्रीमती निर्मला सिँह ने की तथा मुख्य अतिथि हिमांशु श्रोत्रिय निष्पक्ष रहे। विशिष्ट अतिथि का दायित्व मिथलेश राकेश ने संभाला।कवि गोष्ठी का संचालन गीतकार कमल सक्सेना ने किया। कवि गोष्ठी का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन से शुरू हुआ। माँ शारदे की वंदना अविनाश अग्रवाल ने की।

 

निर्मला सिँह ने अपनी कविता पढ़ते हुए कहा कि,,,

 

हर आने वाला दिन हमारी जिंदगी की देह एक नया लिबास ओढ़ती है। और बीते दिन का लिबास उतार कर वक़्त की अरगनी पर टांग देती है।

 

हिमांशु श्रोत्रिय निष्पक्ष ने अपनी ग़ज़ल कुछ ऐसे पढ़ी,,

 

ग़ज़ाला पर ग़ज़ल कहने की कोशिश है मुहब्बत में,

 

यही लिखकर के भेजा है उसे पहले-पहल ख़त में।

 

सितारों से भरे इस आस्मां को ओढ़नी कर दूँ,

 

यही कोशिश है दीवाने की जो डूबा है उल्फ़त में। जिसपर सभी ने जोरदार तालियाँ बजायीं।

 

कमल सक्सेना ने श्रृंगार क़े कुछ मुक्तक सुनाये जिन्हें सभी ने पसंद किया। तथा उसके बाद अपनी ग़ज़ल कुछ ऐसे पढ़ी,,,

 

तन्हाइयों की रात ज़ब आधी गुज़र गयी। इस दिल क़े आईने में इक सूरत उतर गयी। हम ज़िन्दगी क़े कारवां को देखते रहे। इक अजनबी क़े साथ वो जाने किधर गयी। जिसे सभी ने पसंद किया।

 

मिथलेश राकेश ने अपनी ग़ज़ल पढ़ते हुए कहा कि,,,

 

सफर जितना करो घर लौटकर आना जरूरी है। बहुत ऊँचा उठो लेकिन ज़मीं पाना जरूरी है। अगर मशहूर होने की तमन्ना पाल बैठे हो, मुखालिफ ग़र हवा है उससे टकराना जरूरी है। पसंद की गयी।

 

संस्था की अध्यक्ष व आयोजक अल्पना नारायण ने अपनी ग़ज़ल कुछ ऐसे पढ़ी,,,

 

बुझी कब प्यास इस दिल की नदी आई स्वयं लब तक।

 

बिखरते रेत से सपने संभाले हम इन्हे कब तक। तुम्हें समझा तुम्हें जाना न जाने क्यों मगर फिर भी.

 

न समझे तुम हमें अब तक न समझे तुम हमें अब तक। ग़ज़ल पर जोरदार तालियाँ बजीं।

 

सीमा सक्सेना असीम ने अपनी रचना पढ़ते हुए कहा कि,,,यह महफ़िल सजती रहे सदा, दिलों में मोहब्बत बसती रहे सदा। मेरी हँसी मेरी शायरी मेरी कविता मेरी हर शाम रोशन करती रहे सदा।

 

मीरा प्रियदर्शनी ने अपनी कविता इस तरह पढ़ी,,,

 

मिट्टी का दीपक कहता है खुद जलकर उजियारा दो।

 

टूटे हुए दिलों को जोड़ो सबको प्रेम का सहारा दो।

 

मोना प्रधान ने कहा कि,,

 

पंछी उड़े आकाश में, मछली नीरे तीर

 

मनुआ तो चहुं दिशा उड़े, फिर भी रहे अधीर ।

 

दरिया का कतरा बोला, ये सागर क्यों है इठलाता

 

इसका खारा जल क्या जाने, किसी पथिक प्यासे की पीर।

 

अविनाश अग्रवाल ने अपनी ग़ज़ल पढ़ते हुए कहा कि,,

 

गिरा जा रहा है महल मेरे दिल का

 

जरा आकर कर जाओ इसकी मरम्मत।

 

मीना अग्रवाल ने अपनी ग़ज़ल कुछ ऐसे पढ़ी,,,,

 

सारा जिस्म मेरा इश्क़ की आग में जल गया। तड़पने क़े लिये यह दिल क्योंकर बच गया

 

नीतू गोयल ने अपनी कविता कुछ ऐसे पढ़ी,,,

 

प्रेम से ठगी गयी हूँ जान गयी हूँ जीवन के कठोर नियम

 

रिश्तों में बंध कर रहना है तो ठगे जाती रहो कोई नुकसान नहीं।

 

अंत में कवि गोष्ठी की आयोजक अल्पना नारायण ने सभी का आभार व्यक्त किया।

 

 

 

 

 

 

 

सेवा में

 

संपादक महोदय

 

 

 

 

 

 

 

कृपया लेखिका संघ की कवि गोष्ठी का समाचार प्रकाशित करके अनुग्रहित करें।

 

 

 

 

 

 

 

धन्यवाद,,,,

 

 

 

 

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